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मौद्रिक नीति

मौद्रिक नीति के बारे में-

✍️मौद्रिक नीति ऐसी प्रक्रिया है, जिसकी मदद से रिजर्व बैंक अर्थव्यवस्था में पैसे की आपूर्ति को नियंत्रित करता है।

✍️भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) हर दूसरे महीने मौद्रिक नीति की समीक्षा करता है।

✍️इसमें अर्थव्यवस्था की स्थिति को देखते हुए नीतिगत ब्याज दरें घटाने या बढ़ाने का फैसला किया जाता है।

✍️यह फैसला केंद्रीय बैंक की मौद्रिक नीति समिति (एमपीसी) लेती है। इसका गठन 27 जून 2016 को किया गया।

✍️भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम प्रावधान के अनुसार मौद्रिक नीति समिति के सदस्यों में  3 सदस्य आरबीआई से तथा 3 सदस्य केंद्रीय बैंक से होते हैं। आरबीआई का गवर्नर का पदेन अध्यक्ष होता है तथा डिप्टी गवर्नर मौद्रिक नीति समिति के प्रभारी के तौर पर काम करता है।


✍️मौद्रिक नीति से कई मकसद साधे जाते हैं. इनमें महंगाई पर अंकुश, कीमतों में स्थिरता और टिकाऊ आर्थिक विकास दर का लक्ष्य हासिल करना शामिल है। रोजगार के अवसर तैयार करना भी इसके उद्देश्यों में से एक है।

✍️अर्थव्यवस्था में पैसे की आपूर्ति पर बैंकों के कैश रिजर्व रेशियो या ओपन मार्केट आपरेशन से सीधे असर डाला जा सकता है। रेपो रेट और रिवर्स रेपो रेट के जरिए कर्ज की लागत को बढ़ाया या घटाया जा सकता है।

✍️नरम रुख रखने पर आरबीआई मौद्रिक नीति में प्रमुख ब्याज दरों को घटाता है। इससे अर्थव्यवस्था में पैसों की आपूर्ति बढ़ने का रास्ता खुल जाता है। बाजार में नकदी बढ़ने से आर्थिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं।

✍️जब केंद्रीय बैंक अपना रुख कठोर करता है तो ब्याज दरों को बढ़ाया जाता है। इससे अर्थव्यवस्था में नकदी घट जाती है। इसका उत्पादन और खपत दोनों पर विपरीत असर होता है। इससे अर्थव्यवस्था की रफ्तार घटती है।

✍️रेपो रेट- वह दर जिस पर बैंक अल्पकालीन जरूरतों को पूरा करने के लिए आरबीआई से ऋण लेते हैं।

इसका प्रभाव- यदि यह सस्ती होती है तो बैंकों के लिए होम लोन, ऑटो लोन और पर्सनल लोन जैसे कुदरा कर्ज की दर को कम करने में सहूलियत होती है।

रेपो रेट में बदलाव नहीं होने से फिक्स डिपाजिट वालों की ब्याज दर पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।




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