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निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009

निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम -2009
RTE ACT-2009  1 अप्रैल 2010 से लागू हुआ।

RTE अधिनियम का उद्देश्य 6 से 14 वर्ष की आयु के सभी बच्चों को प्राथमिक शिक्षा प्रदान करना है।

धारा 12 (1) (C/जी)  में कहा गया है कि गैर-अल्पसंख्यक निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल आर्थिक रूप से कमज़ोर और वंचित पृष्ठभूमि के बच्चों के लिये प्रवेश स्तर ग्रेड में कम- से-कम 25% सीटें आरक्षित करें।

103वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम ने अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन करके आर्थिक रूप से कमज़ोर वर्गों (EWS) के लिये शिक्षा संस्थानों, नौकरियों और दाखिले में आर्थिक आरक्षण (10% कोटा) की शुरुआत की।

यह अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिये बनाई गई 50% आरक्षण की नीति में कवर नहीं हुए गरीबों के कल्याण को बढ़ावा देने के लिये लागू की गई थी।

राजस्थान इकोनामिक सर्वे 2020-21 में

निजी विद्यालयों में 25% सीटें कमजोर और वंचित समूह के बालक व बालिकाओं के लिए आरक्षित रखी गई है।
राज्य सरकार द्वारा निजी विद्यालय में 25% निःशुल्क प्रवेश के प्रभावी निगरानी एवं समय पर राशि पुनर्भरण (राज्य सरकार के मापदंडों के अनुसार) एक वेब पोर्टल www.rte.raj.nic.in विकसित किया गया है।

धारा 12 (1) (C/जी) में कहा गया है कि गैर-अल्पसंख्यक निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल आर्थिक रूप से कमज़ोर और वंचित पृष्ठभूमि के बच्चों के लिये प्रवेश स्तर ग्रेड में कम- से-कम 25% सीटों से के लिए आय सीमा 1 लाख से बढ़ाकर 2.5 लाख कर दी गई है।



शिक्षा का अधिकार के सौ वर्ष : 1911 से 2010

प्रश्न-1 देश में शिक्षा के अधिकार की मांग पहली बार कब हुई?

"मैं परिषद के समक्ष, विचार के लिए निम्नलिखित प्रस्ताव पेश करता हूं...इस देश में राज्य को जन शिक्षा के संदर्भ में उसी तरह की ज़िम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए जैसे कि अधिकांश सभ्य देशों की सरकारें पहले से ही निर्वाह कर रही हैं और जिसके लिए अच्छी तरह सुनियोजित योजना बनानी चाहिए और उसपर अमल होने तक इस पर दृढ़ रहना चाहिए। इसी पर उन लाखों-करोड़ों बच्चों की बेहतरी निर्भर करती है जो शिक्षा के प्रभाव में आने की प्रतीक्षा करे रहे हैं।"

उपरोक्त शब्द उस प्रस्ताव का अंश हैं जो गोपाल कृष्ण गोखले ने 18 मार्च, 1910 को ब्रिटिश विधान परिषद के समक्ष भारत में निःशुल्क और अनिवार्य प्राथमिक शिक्षा के प्रावधान की मांग के लिए प्रस्तुत किया था। 

इस पहल को निश्चित रूप से निम्नलिखित घटनाओं के क्रम के अंश के तौर पर देखा जाना चाहिए-

1870 ब्रिटेन में अनिवार्य शिक्षा अधिनियम पारित । 
1882 भारतीय शिक्षा आयोग: भारतीय नेताओं द्वारा जन शिक्षा और अनिवार्य शिक्षा के प्रावधान की मांग। 
1893 बड़ौदा महाराज ने अमरेली ताल्लुका में लड़कों के लिए अनिवार्य शिक्षा शुरू की। 
1906 बड़ौदा महाराज ने शेष राज्य में अनिवार्य शिक्षा का विस्तार किया। 
1906 गोपाल कृष्ण गोखले ने इम्पीरियल विधान परिषद के समक्ष निःशुल्क और अनिवारा शिक्षा प्रस्तावित करने की दलील दी। 
1910 गोपाल कृष्ण गोखले ने प्राइवेट मेंम्बर्स विधेयक प्रस्तावित किया (खारिज) 
1917 विट्ठल भाई पटेल ने विधेयक पारित कराने में सफलता पाई - अनिवार्य शिक्षा पर पहला विधेयक पारित हुआ (जो पटेल एक्ट के नाम से लोकप्रिय हुआ)। 
1918 ब्रिटिश भारत के सभी प्रांतों में संविधि सूची में अनिवार्य शिक्षा अधिनियम शामिल हुआ। 
1930 बेहतर शिक्षा (मात्रा पर कम ध्यान देते हुए) के लिए होग समिति की सिफारिशों ने प्राथमिक शिक्षा के विकास 
और विस्तार में बाधा पहुंचाई।  

हालांकि इनमें से कई पहले गंभीरतापूर्वक कार्यान्वित नहीं हुई, संसाधनों की कमी और दबाव जिसके मुख्य कारण थे।

प्रश्न-2 इस मांग में महात्मा गांधी का क्या योगदान था?

वर्षों से बदतर हुई स्थिति ने महात्मा गांधी को 1937 में सार्वभौमिक शिक्षा के लिए भावोत्तेजक आह्वान करने पर विवश किया । सार्वभौमिक शिक्षा के लिए यथोचित वित्त व्यवस्था की उनकी दलील को यह जवाब मिला कि किसी भी तरह अगर कुछ किया जा सकता है तो केवल एक रास्ता है कि शराब की बिक्री से प्राप्त राजस्व को इस्तेमाल किया जाए। इसका मतलब यह था कि या तो वे शराब के प्रतिबंध पर अपना पक्ष वापिस लेते या सार्वभौमिक शिक्षा की अपनी मंशा को राज्य के समर्थन से करते, जिसे उन्होंने सपाट ढंग से कहा - नए सुधारों की क्रूरतम विडम्बना इस तथ्य में निहित है कि हमारे लिए कुछ नहीं छोड़ा गया पर हमारे बच्चों को शिक्षा देने के क्रम में शराब से प्रापा राणस्त वापिस लौटाया जाता है (हरिजन, 5,222)। उन्होंने स्व-पोषित शिक्षा प्रस्तावित करके उसका समाधान पा लिया जिसे वे शैक्षिक पहेली कहा करते थे, इसे बाद में नई तालीम के नाम से जाना गया। 

प्रश्न-3 किस तरह संविधान के मौलिक अनुच्छेद 45 का जन्म हुआ?

1946: संविधान सभा ने काम शुरू किया।

1947 : सार्वभौमिक प्राथमिक शिक्षा को दस सालों के अंदर अपेक्षाकृत कम कीमत (लागत) पर प्राप्त करने के तरीके और साधनों का पता लगाने के लिए तरीके और साधन (खेर) समिति नियुक्त हुई।

1947: संविधान सभा की मौलिक अधिकारों की उप समिति ने निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकारों की सूची में स्थान दिया।

"अनुच्छेद 23 -प्रत्येक नागरिक को निःशुल्क शिक्षा का अधिकार है और यह राज्य का दायित्व होगा कि इस संविधान के आरंभ होने के दस साल की अवधि के अंदर सभी बच्चों को जब तक वो अपनी चौदह साल की आयु पूरी नहीं कर लेते निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराएगा।"

1947 (अप्रैल) संविधान सभा की सलाहकार समिति ने निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा को मौलिक अधिकार के रूप में खारिज किया (लागते इसकी वजह बनी)। इस अनुच्छेद को गैर-न्यायोचित मौलिक अधिकारों (बाद में जिन्हें राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत कहा गया) की सूची में स्थान दिया गया।

1949 संविधान सभा में इस पर बहस हुई और 'अनुच्छेद 36' की पहली पंक्ति को हटा दिया गया... "प्रत्येक नागरिक को निःशुल्क शिक्षा का अधिकार है और यह राज्य का दायित्व होगा कि.... और इसे "...राज्य यह प्रयास करेगा” से स्थानापन्न कर दिया गया। प्राथमिक शिक्षा शब्द को क्यों हटाया गया? "अनुच्छेद 18 में एक प्रावधान दिया गया कि 14 साल से कम आयु के किसी बच्चे का रोजगार में होना निषेध है। स्वाभाविक रूप से, यदि 14 साल से कम का बच्चा रोजगार में नहीं है, बच्चे को निश्चित रूप से किसी शैक्षिक संस्थान में दाखिल होना चाहिए। अनुच्छेद 36 का यही उद्देश्य है।" श्री बी आर अम्बेडकर,23 नवम्बर 1949

1950  अंततः राज्य के नीति निदेशक सिद्धांत के अनुच्छेद 45 में यह स्वीकार किया गया - "राज्य इस संविधान के लागू होने के दस साल की अवधि में सभी बच्चों के लिए जब तक कि वे चौदह साल की आयु प्राप्त नहीं कर लेते, निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास करेगा।"

यह न्यायोचित अधिकार को नकारने जैसा था । अनुच्छेद 45 के अंतिम रूप की अपर्याप्तता को के.टी. शाह द्वारा अप्रैल 1947 में उनकी असहमति के स्वर में पहले से ही इस प्रकार देखा गया था:

“एक बार जब इस प्रकार के (न्यायोचित) अधिकार की स्पष्ट घोषणा की गई,जो इसके लिए उत्तरदायी हैं, उन्हें इसे प्रभावशाली बनाने के लिए तरीके और साधन तलाशने होंगे। यदि वे इस तरह के आरोप खुद पर नहीं लेना चाहते, तो वे इस मामले में अपनी निष्क्रियता को उचित सिद्ध करने के लिए अपने हित में क्षमा हेतु प्रवृत हो सकते हैं, तटस्थ अथवा खराब।"

के.टी.शाह का यह कथन बिल्कुल सच निकला। अनुच्छेद 45 के बारे में प्रसिद्ध अर्थशास्त्री एल.सी. जैन ने पाया कि संविधान को अपनाने के बाद अगले दस वर्षों में, गांधीवादी शिक्षा का लोकव्यापीकरण हो जाना चाहिए था, लेकिन एक भी वर्ष के बजट भाषण में शिक्षा का नाम भी शामिल नहीं किया गया था। इससे यह स्पष्ट होता है कि संसाधनों की कमी की दलील के कारण से गांधी जी जैसे व्यक्ति को भी विकल्प खोजने पर मजबूर होना पड़ा एवं अम्बेडकर जी को भी प्रारूपित अनुच्छेद 36 को रद्द करने पर सहमति जतानी पड़ी। 2009 अधिनियम में से 0-6 व 14-18 आयु के बच्चों का गायब होना संसाधनों की कमी जैसी दलील का कारण है और जो कुछ अधिनियम में है वह इस पर निर्भर करेगा कि क्या सरकार पर्याप्त धनराशि उपलब्ध कराएगी या नहीं इस संदर्भ में प्रधानमंत्री का 1 अप्रैल, 2010 के राष्ट्र को संबोधित भाषण में यह कहना कि संसाधनों की कमी को इस अधिनियम के क्रियान्वयन में बाधा नहीं रहने दिया जाएगा, एक आशा की किरण है। फिर भी यह देखना होगा कि क्या यह कथन वाकई नीति का सिद्धांत बनेगा या नहीं।

प्रश्न-4 सर्वोच्च न्यायालय का इस बारे में क्या कहना था?

सर्वोच्च न्यायालय ने 1993 में 14 साल तक की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क शिक्षा को अधिकार के रूप में (उन्नीकृष्णन और अन्य विरुद्ध आंध्र प्रदेश राज्य व अन्य) यह कहते हुए संघटित कियाः

“इस देश के नागरिकों को शिक्षा का मौलिक अधिकार प्राप्त है। यह अधिकार अनुच्छेद 21 से निकला है। हालांकि यह एक निरपेक्ष अधिकार नहीं है। इराकी विषय-वस्तु और मापदंडों को अनुच्छेदों 45 और 41 के आलोक में निधारिरा करना पड़ेगा। दूसरे शब्दों में इस देश के प्रत्येक बच्चे को चौदह साल की उम्र तक निःशुल्क शिक्षा का अधिकार है। इसके बाद उराका शिक्षा का अधिकार राज्य के विकास और आर्थिक क्षमता की सीमा का विषय होगा।"

प्रश्न-5 86वां संशोधन क्या है?

उन्नीकृष्णन फैसले से प्रेरित और शिक्षा के अधिकार को लागू करने की जनता की मांग पर 1993 से परवर्ती सरकारों ने शिक्षा को मौलिक अधिकार बनाने हेतु संवैधानिक रांशोधन लाने की दिशा में काम किया। दिसम्बर 2006 में 86वां संशोधन प्रणीत हुआ जिसके द्वारा संविधान में निम्नलिखित अनुच्छेद सम्मिलित किए गए

1. संविधान के अनुच्छेद 21 के बाद एक नए अनुच्छेद 21-ए का समावेश हुआ, निम्नलिखित अनुच्छेद सग्गिलित किया जाएगा, नामतः

शिक्षा का अधिकार - "21-ए राज्य 6 से 14 वर्ष के आयु वर्ग वाले सभी बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा उपलब्ध कराने का, ऐसी रीति में जो राज्य विधि द्वारा, अवधारित करे, उपबंध करेगा।"

2. अनुच्छेद 45 के लिए स्थानापन्न - संविधान के अनुच्छेद 45 के लिए निम्नलिखित अनुच्छेद स्थानापन्न किया जाएगा, नामतः आरंभिक बाल्यावस्था सुरक्षा और छह वर्ष से कम उम्र के बच्चों की शिक्षा का प्रावधान।

"45 राज्य, सभी बच्चों को जब तक वे अपनी छह वर्ष की उम्र पूरी नहीं कर लेते, बचपन-पूर्व सुरक्षा उपलब्ध कराने का प्रयास करेगा।"

3. अनुच्छेद 51-ए का संशोधन - संविधान के अनुच्छेद 51-ए में धारा (जे) के बाद, निम्नलिखित धारा जोड़ी जाएगी, नामतः

"(के) यदि गाता-पिता या संरक्षक हैं, 6 वर्ष से 14 वर्ष तक की आयु वाले अपने, यथास्थिति बालक या प्रतिपाल्य के लिए शिक्षा के अवसर प्रदान करें।"

प्रश्न-6 यह कहा गया है कि 86वां संशोधन, उन्नीकृष्णन फैसले से विचलित हुआ; कैसे?

नीति निदेशक सिद्धांतों के मूल अनुच्छेद 45 में 'चौदह वर्ष तक' पद का इस्तेमाल किया गया था और उन्नीकृष्णन फैसले में कहा गया तक कि बव्या 14 वर्ष की आयु पूर्ण करता है। इन दोनों परिभाषाओं में 0-6 वर्ष की आयु निहित है। अनुच्छेद 21-ए में 6-14 वर्ष के आयु वर्ग तक सीमित किया गया, इसके कारण 0-6 वर्ष के आयु-वर्ग को अधिकार से हटा दिया गया; निदेशक सिद्धांतों के अनुच्छेद 45 से इसे पदावनत करता है । उन्नीकृष्णन फैसले में आगे यह भी देखा गया कि शिक्षा का अधिकार विद्यगान है और राज्य की आर्थिक क्षमता पर 14 वर्ष तक की आयु निर्भर नहीं हो सकती। अनुच्छेद 21-ए कहता है कि इसे उस प्रकार अमल में लाया जाएगा जिस प्रकार राज्य उसे विधि द्वारा अवधारित करेगा। अतः यह उस कानून पर निर्भर बनाया गया जो राज्य इसे लाए। यह अधिनियम वह कानून है, जिसे पारित होने में 86वें संशोधन के बाद आठ वर्ष लग गए। इसलिए उन्नीकृष्णन फैसले के बाद इस अधिकार को लागू होने में 17 वर्ष लग गए, और वह भी केवल 6-14 वर्ष के प्रतिबंधित | आयु के लिए। यहॉ यह ध्यान देने योग्य है कि शिक्षा पर संसदीय स्थायी समिति ही है जिसने संभावित 86वें संवैधानिक संशोधन के लिए 6 से 14 वर्ष की आयु का सुझाव देकर प्रतिबंधित आयु वर्ग का मार्ग दिखाया।

प्रश्न-7 2009 में कानून बनने के पीछे घटनाओं का क्या क्रम रहा?

दिसम्बर 2002 में 86वें संशोधन के बाद हमारे पास थे

2003 बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा विधेयक, 2003 (राजग सरकार)

2004 बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा विधेयक, 2004 (राजग सरकार)

2005 शिक्षा का अधिकार विधेयक,2005 (जून) (सीएबीई विधेयक)(संप्रग सरकार)

2005 शिक्षा का अधिकार विधेयक,2005 (अगस्त) (संप्रग सरकार)

2006 केन्द्रीय विधान हटाया गया। राज्यों को यह परामर्श दिया गया कि वे शिक्षा का अधिकार विधेयक, 2006 (संप्रग सरकार) के प्रारूप के आधार पर अपने विधेयक बनाएं।

2008-09 केन्द्रीय विधान पुनर्गठित हुआ। निःशुल्क एवं अनिवार्य शिक्षा विधेयक 2008, बच्चों का अधिकार राज्य सभा एवं लोक सभा में प्रस्तावित/पारित। अगस्त 2009 में राष्ट्रपति की संस्तुति। किन्तु अधिनियम व 86वें संशोधन की अधिसूचना, आठ महीने बाद 1 अप्रैल, 2010 को जारी हुई (संप्रग सरकार) 

ध्यान दें कि विधेयक के पहले दो प्रारूपों में अधिकार शब्द गायब था। यह शब्द "कैब 2005" प्रारूप के बाद ही इस्तेमाल हुआ है। सन् 2006 में सरकार ने निर्णय लिया कि केन्द्रीय कानून की ज़रूरत नहीं है। और राज्यों से कहा गया कि वह अपने-अपने कानून लाएं, जिसके लिए एक निहायत ही साधारण गॉडल प्रारूप राज्यों को भेजा गया। दलील यह थी कि केन्द्र में इतना पैसा नहीं है। यह तो जनता का दबाव था कि सन् 2008 में केन्द्रीय कानून को वापस लाया गया।

भारतीय अधिनियम निम्नलिखित कारणों से अन्य देशों के ऐसे अधिनियमों में विशिष्ट है:

निःशुल्क की परिभाषा शुल्फ न देने से काफ़ी आगे जाती है।

अनिवार्यता सरकारों पर है न कि पालकों पर।

ज़ोर सम्मिलित शिक्षा, और भेदभाव खत्म करने पर है।

पठन-पाठन प्रक्रिया में गुणवत्ता की लामबंदी।

अधिनियम के क्रियान्वयन की देखरेख एक अलग संवैधानिक आयोग करेगा।

न्यूनतम शाला की परिभाषा।

बच्चों की भावनाओं, मानसिक दबाव व भयं को कानून के दायरे में लाना।

अधिनियम इस मायनों में भी एक मील का पत्थर है कि इसको लाने का इतिहास सौ वर्षों का है। अगर हम 1857 के युद्ध को भारत की आज़ादी की लड़ाई के मील के पत्थर के रूप में देखें, तो उसे एक वास्तविकता बनने में,1947 तक, 90 वर्ष लग गए। लेकिन शिक्षा के अधिकार को लाने में एक अतिरिक्त दशक लगा और इन सौ सालों में से 62 साल आज़ादी के बाद के हैं। इस कारण से इस अधिनियम की ऐतिहासिक महत्ता काफ़ी अधिक है।

प्रश्न-8 क्या यह अधिनियम भारत में सभी जगह लागू होगा? इसमें जम्मू कश्मीर को क्यों अलग रखा गया?

संविधान की धारा 370 के तहत काई केन्द्रीय अधिनियम स्वतः जम्मू व कश्मीर में लागू नहीं होते। जम्मू-कश्मीर विधानमंडल, हालांकि ऐसा विधेयक पारित कर सकती है ताकि पूरे देश तरह यह अधिनियम वहां भी लागू हो। तथापि यह अधिनियन अन्य सभी राज्यों व केन्द्र शासित प्रदेशों में लागू होगा।
Note:- वर्तमान में यह जम्मू कश्मीर में भी लागू है।

प्रश्न-9 क्या यह अधिनियम संविधान की धाराओं 29 व 30 में परिभाषित अल्पसंख्यक संस्थानों पर भी लागू होता है?

हां, जैसा कि इसकी पृष्ठभूमि है यह अधिनियम संसद में हाल ही में पारित संशोधनों के साथ इस प्रकार के संस्थानों पर भी लागू होता है (अधिनिराम के प्रस्तावित संशोधन के लिए प्रः 83 देखें)।

प्रश्न-10 शिक्षा पर राज्यों के मौजूदा अधिनियम इस नवीन शिक्षा का अधिकार अधिनियम के संदर्भ में कहां ठहरते हैं?

वे अधिनियम केन्द्रीय अधिनियम द्वारा अवधारित किये जाएंगे। संविधान के अनुच्छेद 254 के अनुसार (नीचे दिया जा रहा है). एक केन्द्रीय अधिनियम समवर्ती विषयों के सभी मौजूदा राज्य अधिनियमों का स्थानापन्न होता है। राज्य इस प्रकार के केन्द्रीय अधिनियम में संशोधन कर सकते हैं पर इसमें राष्ट्रपति की संस्तुति आवश्यक है । यद्यपि, यदि राज्य अधिनियम में कुछ ऐसा है जिस पर केन्द्रीय अधिनियम मौन है, तो वह राज्य अधिनियम का भाग रह सकता है।

254 (1) यदि किसी राज्य के विधान मंडल द्वारा बनाई गई विधि का कोई उपबंध संसद द्वारा बनाई गई विधि के, जिरो अधिनियमित करने के लिए संसद सक्षम है, किसी उपबंध के या समवर्ती सूची में प्रगणित किसी विषय के संबंध में विद्यमान विधि के किसी उपबंध के विरुद्ध है, तो खंड (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए यथास्थिति संसद द्वारा बनाई गई विधि, चाहे वह ऐसे राज्य के विधान मंडल द्वारा बनाई गई विधि से पहले या उराके बाद में पारित की गई हो, या विद्यमान विधि,अभिभावी होगी और उस राज्य के विधान मंडल द्वारा बनाई गई विधि उस विरोध की मात्रा तक शून्य होगी।

(2) जहां राज्य के विधान मंडल द्वारा समवर्ती सूची में प्रगणित किसी विषय के संबंध में बनाई गई विधि में कोई ऐसा उपबंध अन्तर्दिष्ट है, जो संसद द्वारा पहले बनाई गई विधि के या उस विषय के संबंध में किसी विद्यमान विधि के उपबंधों के विरुद्ध है, तो यदि ऐसे राज्य के विधान मंडल द्वारा इस प्रकार बनाई गई विधि को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित रखा गया है और उस पर उसकी अनुमति मिल गई है तो वह विधि उस राज्य में अभिभावी होगी; परन्तु इस खंड की कोई बात संसद को उसी विषय के संबंध में कोई विधि, जिसके अन्तर्गत ऐसी विधि है जो राज्य के विधान मंडल द्वारा इस प्रकार बनाई गई विधि का परिवर्धन, संशोधन या निरसन करती है, किसी भी रामय अधिनियमित करने से निवारित नहीं करेगी।

प्रश्न-11 क्या अधिनियम के तहत शिक्षा का अधिकार में घर आधारित शिक्षा, वैकल्पिक शिक्षा अथवा किसी अन्य वैकल्पिक स्थानों पर शिक्षा शामिल है? कोई बच्चा जो घर पर ही अध्ययन कर रहा है,खर्चे के लिए राज्य से मांग कर सकता है?

नहीं, अधिनियम बच्चे के निःशुल्क शिक्षा के अधिकार को अधिनियन में परिभाषित स्कूल के अलावा किसी अन्य स्थान पर मान्यता नहीं देता। इस अर्थ में अधिनियम निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा जैसा है। वास्तव में सभी बच्चों के लिए शिक्षा अनिवार्य होगी।

प्रश्न-12 क्या अधिनियम के तहत गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा संचालित स्कूलों को वैध स्कूलों के रूप में अर्हता प्राप्त हो सकेगी?

हॉ, बशर्ते कि वे स्कूल अधिनियम में परिभाषित नियमो और मानकों को अधिनियम की अधिसूचना जारी होने के तीन साल के अंदर प्राप्त कर लें।

प्रश्न-13 क्या मुक्त शाला से पढ़ाई अधिनियम के अन्तर्गत संभव होगी?

मुक्त शाला के अन्तर्गत 6 से 14 वर्ष तक परीक्षा का प्रावधान रहा है। यह आम तौर पर उन बच्चों के लिए रहा है जो स्कूल में नहीं हैं. या वैकल्पिक अथवा अनौपचारिक स्कूल में हैं। चूंकि अधिनियग के अन्तर्गत बोर्ड परीक्षा के बदले समग्र व सतत मूल्यांकन प्रणाली ही चलेगी, न आस-पड़ोस के न्यूनतम मापदंड वाले स्कूल में पढ़ाई अनिवार्य होनी चाहिए. इस कारण से मुक्त शाला से प्रमाणित परीक्षाएं अब 6-14 वर्ष की आयु के लिए संभव नहीं होंगी। राष्ट्रीय मुक्त शाला संस्थान में इस आयु की परीक्षाओं को बंद करने की घोषणा भी जारी की गई है, वह सभी बच्चे जो किसी अनौपचारिक स्कूल में पढ़ रहे हैं, उन सबका अधिकार बनता है कि वे आस-पड़ोस के स्कूल में जाएं, जिसके लिए उन्हें पूर्व स्कूल का स्थानांतरण प्रमाण पत्र या अन्य संबंधित प्रमाण पत्र आवश्यक नहीं होगा।

अधिनियम में परिभाषाएं

प्रश्न-14 "समुचित सरकार क्या है?

. शिक्षा संविधान के तहत समवर्ती सूची का विषय है, जिसका अर्थ है कि दोनों केन्द्र व राज्य सरकारें इसके लिए उत्तरदायी हैं, अधिनियम में समुचित सरकार से अभिप्राय या तो इन सरकारों से है या केन्द्र शासित प्रदेश की विधान मंडल (जैसे दिल्ली) से है। सम्पूर्ण परिभाषा अधिनियम में 2 (ए) में है।

प्रश्न-15 बच्चे की आयु की परिभाषा कैसे निर्धारित की गई थी?

जैसा कि पहले उल्लेख किया जा चुका है. इसे अधिनियम के अनुच्छेद 21 ए के द्वारा परिभाषित किया गया है। सरकार को ऐसा निर्णय करने के लिए स्पष्ट है कि इस अधिनियम को संसदीय अनुमोदन प्राप्त है। मूल अनुच्छेद 45 और उन्नीकृष्णन फैसले दोनों में आयु समूह 0-6 वर्ष है। किशोर न्याय अधिनियम में 18 वर्ष तक बच्चे की आयु परिमाषित की है। संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन (यूएनसी आरसी) जिसमें भारत ने हस्ताक्षर किए हैं, ने भी 0-18 वर्ष तक बच्चे की आयु को परिभाषित किया है। सिद्धात में किशोर न्याय अधिनियग में यह उल्लेख है, संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार सम्मेलन और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) में शिक्षा का अधिकार अधिनियम के लक्ष्य और उद्देश्य हैं कि आयु को 0-11 तक परिभाषित किया जा सकता है। आर्थिक बाधा के दृष्टिगत वर्तमान अधिनियम 6-14 वर्ष तक के आयु समूह में सीमित है जैसा कि अनुच्छेद 21-ए में निहित है। 

0-18 वर्ष तक बच्चे को आयु को परिभाषित करने के लिए अधिनियम में संशोधन हेतु जन-दबाव की आवश्यकता होगी।

प्रश्न-16 स्थानीय प्राधिकारी क्या है?

अधिनियन स्कूली शिक्षा को समुदाय, (स्कूल प्रबंधन समिति), पंवायती राज संस्थान व सरकार के बीच त्रिखंडीय भागीदारी के रूप में देखता है। जैसा कि परिभाषा 2(एच) से साबित होता है, स्थानीय प्राधिकारी को परिभाषित करने का उद्देश्य पंचायती राज संस्थानों द्वारा विकेन्द्रीकृत प्रशासनिक व्यवस्था को नियंत्रित करना है। किन्तु जैसा कि राज्यों में कई तरह की स्थितियां मौजूद हैं यह 'पद' लचीला है, और यह राज्य सरकारों के ऊपर छोड़ा गया है कि वे समुचित स्थानीय प्राधिकारी अधिसूचित करें। उदाहरण के लिए, झारखंड एक ऐसा राज्य है जहां पंचायत चुनाव अभी तक नहीं हुए हैं और पश्चिम बंगाल में पहले से ही प्राथमिक शिक्षा परिषद है जिसे स्थानीय प्राधिकारी के रूप में अधिसूचित करने का निर्णय लिया जा सकता है। इसी प्रकार, पूर्वोत्तर राज्यों जैसे कि मेघालय में जिला परिषदें हैं जिन्हें वे स्थानीय प्राधिकारी के रूप में रखना चाहें।

प्रश्न-17 बिना माता-पिता या संरक्षक के बच्चों के बारे में इस अधिनियम में क्या है?

अनुच्छेद 2 (के) बच्चे के माता-पिता को परिभाषित करता है और अनुच्छेद 10 भी गाता-पिता के, उनके बच्चों की शिक्षा सुनिश्चित करने हेतु कर्तव्य का उल्लेख करता है। किन्तु जैसा कि अनुच्छेद 8 [व्याख्या (आई)]. के तहत माता-पिता के बजाय राज्य पर दबाव बनाता है, समुचित सरकार को ही बिना माता पिता की शिक्षा को सुनिश्चित करने का उत्तरदायित्व लेना पड़ेगा।

प्रश्न-18 'विहित' का क्या अर्थ है?

जहां कहीं भी शब्द 'विहित आता है, यह बताता है कि समुचित सरकार प्रासंगिक नियम बनाएगी।

प्रश्न-19 स्कूल को कैसे परिभाषित किया गया है?

अनुच्छेद 2(एन) पर चार श्रेणियां परिभाषित की गई हैं: (1) सरकार अथवा स्थानीय प्राधिकारी द्वारा अनुदान प्राप्त/निधिबद्ध और प्रबंधित (2) निजी किन्तु सरकार अथवा स्थानीय प्राधिकारी द्वारा अनुदान प्राप्त (3) विशिष्ट श्रेणी के अन्ार्गत परिभाषित स्कूल जैसे केन्द्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय, सैनिक स्कूल, इंडो-तिब्बतन सीमा पुलिस स्कूल (4) निजी स्कूल जिन्हें सरकार या स्थानीय प्राधिकरण से किसी भी प्रकार का अनुदान नहीं मिलता।

प्रश्न-20 'छंटनी प्रक्रिया' का क्या अर्थ है?

- बच्चे की कोई भी परीक्षा या साक्षात्कार/अन्तःसंवाद अथवा माता-पिता का साक्षात्कार/ अन्तःसंवाद | अनुच्छेद 2(ओ), अनुच्छेद 13(2)(बी) के साथ इनमें से किसी भी प्रकार की छंटनी प्रक्रिया का निषेध करता है और केवल आकस्मिक प्रक्रिया को ही स्कूल में बच्चे के दाखिले के लिए मान्यता देता है। यह निषेध सभी स्कूलों और निजी अथवा नवोदय जैसे विशेष वर्ग के रकूलों पर भी लागू होगा। कोई भी स्कूल प्रारंभिक स्तर पर छंटनी की प्रक्रिया अपनाने के कारण विशेष वर्ग के दर्जे का दावा नहीं कर सकता। आकस्मिक प्रक्रिया से तात्पर्य है कि यदि स्कूल में उपलब् में सीटों की तुलना में ज़्यादा बच्चे आवेदन करते हैं तब एक खुली लॉटरी व्यवस्था का इस्तेमाल उन सीटों को भरने के लिए किया जाएगा। यह सभी श्रेणियों के स्कूलों पर लागू होता है। खुली लॉटरी प्रक्रिया के लिए कई तरीके नियोजित किए जा सकते हैं, जिनमें राबरो सरल है आवेदन करने वाले बच्चे का नाम/नंबर तह की गई कागज़ की पर्ची पर लिखना। इन्हें एक पात्र में रखा जा सकता है, जिसमें से बच्चे स्वयं बिना किसी प्रयोजन के पारदर्शी रुप से माता-पिता की उपस्थिति में पर्ची निकालें।

प्रश्न-21 'वंचित बच्चे' और 'कमज़ोर तबके' से आने वाले बच्चे कौन हैं?

वंचित समूहों से आने वाले बच्चों को 2(डी) में परिभाषित किया गया है। इनमें अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति और अन्य सामाजिक व शैक्षणिक रूप से पिछड़ी श्रेणियां जो सांस्कृतिक, आर्थिक, सामाजिक, भौगोलिक, भाषाई व लैंगिक परिस्थितियों के आधार पर अथवा अन्य श्रेणियां जिन्हें समुचित सरकार अलग से अधिसूचित कर सकती है, शामिल हैं। समुचित सरकार, उदाहरण के लिए राज्य के विभिन्न जिलों और उप-जिलों/ तहसीलों में अधिसूचित कर सकती है, शैक्षणिक रूप से पिछड़े धार्मिक समुदायों, जैसे सच्चर समिति और इस तरह की अन्य समितियों द्वारा चिह्नित किए गए हैं। कमजोर तबके जैसा कि 2(ई) में परिभाषित किया गया है, वे बच्चे हैं जो कमजोर आर्थिक श्रेणियों रो आते हैं जिन्हें समुचित सरकार को माता-पिता/संरक्षक की न्यूनतम वार्षिक आय के आधार पर अधिसूचित करना होगा।

निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार

प्रश्न-22 अधिनियम में 'निःशुल्क शिक्षा से क्या तात्पर्य है?

प्रायः निःशुल्क शिक्षा का अर्थ शुल्क का भुगतान न करने से लगाया जाता है। किन्तु शुल्क, शैक्षणिक खर्चे का एक केवल एक भाग है और ग़रीब परिवार प्रायः शिक्षा पर होने वाले अन्य खर्चों को वहन नहीं कर पाते। इन वर्षों में पाठ्यपुरतकों, लेखन सामग्री, गणवेश, परिवहन, निःशक्त बच्चों के लिए शैक्षणिक और सहायक सामग्री (श्रव्य साधन, चश्मे, ब्रेल बुक्स, बैसाखी और अन्य) शामिल हैं, हो सकते हैं। यहाँ तक कि पुस्तकालय शुल्क, प्रयोगशाला शुल्क आदि भी ट्यूशन शुल्क के अंतर्गत नहीं आते। स्कूल छोड़ने की परिघटना विशेष रूप में माता-पिता द्वारा अपने बच्चे के शैक्षणिक व्यय वहन न कर पाने के कारण होती है, कहीं-कहीं तो प्राथमिक शिक्षा के दौरान भी इसे दिमाग में रखते हुए, अधिनियम के अनुच्छेद 3(2) "निःशुल्क पद को यह आदेशित करते हुए विस्तार देता है, “कोई बच्चा किसी भी प्रकार के शुल्क अथवा प्रभार अथवा व्यय का भुगतान करने के लिए उत्तरदायी नहीं होगा, जो उसे प्राथमिक शिक्षा जारी रखने और पूरी करने से रोक सकता है।" निःशुल्क पात्रताओं की एक सुस्पष्ट सूची मॉडल नियमों के 5(1) में बनाई गई है किन्तु यह प्रतिबंधातमक नहीं है, अधिनियम के अनुच्छेद 3(2) के अनुसार, मॉडल नियमों 5(1) में सूचीबद्ध खर्यों के अलावा यदि कोई अन्य प्रभार या खर्च, उदाहरण के लिए ऐसे बच्चों के लिए आवासीय व्यवस्था जिनके माता पिता पलायन करते हैं, जिनके न होने से बच्चे को प्राथमिक शिक्षा जारी रखने अथवा पूरी करने में बाधा उत्पन्न हो सकती है, राज्य को उपलब्ध करानी होगी।

प्रश्न-23 'बाध्यता' किस पर होगी?

अनुच्छेद 8 (व्याख्या)(1) व (2) के अनुसार राज्य निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने और अनिवार्य दाखिले. उपस्थिति और प्राथमिक शिक्षा पूर्ण करने को सुनिश्चित करने के लिए बाध्य है । बाध्यता यह है कि यदि 6-14 वर्ष की उम्र का एक बच्चा किसी चाय की दुकान, कृषि क्षेत्र या इसी तरह के और काम कर रहा है, या घर पर खाना पका रहा है या आस-पास घूम रहा है, जब कि स्कूल कार्य कर रहा हो, सरकार उसके मौलिक अधिकार का हनन कर रही है। यह सुनिश्चित करना सरकार का दायित्व है कि सभी बच्चे स्कूल में उपस्थित हो रहे हैं और प्राथमिक शिक्षा पूर्ण कर रहे हैं। इसका बाल श्रम पर तात्कालिक प्रभाव होता है। यदि बच्चा बाल श्रम में व्यस्त है और स्कूल नहीं जाता, तो सरकार ही कानून के उल्लंघन की जिम्मेदार होती है। फलस्वरूप, बाल श्रम अधिनियम 1986 अब इस अधिनियम से संबद्धता नहीं रखता और श्रम मंत्रालय पर पहले से ही इस बात का दबाव बढ़ता जा रहा है कि 1986 के अधिनियम का पुनरीक्षण और संशोधन कर आरटीई अधिनियम के तालमेल में लाया जाए।

प्रश्न-24 माता-पिता पर यह बाध्यता क्यों नहीं?

भारत जैसे देश में जहां माता-पिता की बहुसंख्या गरीब है, काम के लिए शहरों में पलायन करते हैं, कोई सहयोग की व्यवस्था नहीं है, उन पर दंड के साथ बाध्यता रखने का अर्थ होगा कि उन्हें ग़रीब होने के लिए दंडित किया जा रहा है, जो उनका चयन नहीं है। जैसा कि विख्यात शिक्षाविद् जे.पी. नाईक ने एक बार मज़ाक में टिप्पणी की थी कि यदि माता-पिता को अपने बच्चों को स्कूल न भेजने के कारण जेल में डाल दिया जाए तो जितने बच्चे स्कूलों में होंगे उससे कहीं ज्यादा माता-पिता जेल में होंगे।

प्रश्न-25 यदि माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल नहीं भेजते?

अधिनियम के अनुच्छेद 10 में इसे माता-पिता का कर्तव्य माना गया है कि वे यह सुनिश्चित करेंगे कि उनके बच्चे स्कूल में जाते हैं, बिना किसी निर्धारित दंड के । इसका तात्पर्य है कि स्कूल प्रबंधन समिति के सदस्य, स्थानीय प्राधिकार और समुदाय व्यापक अर्थों में अनिच्छुक माता-पिता को उनका कर्तव्य पूरा कराने के लिए निश्चित प्रयास करेंगे। बाल श्रमिकों और फुटपाथ पर रहने वाले बच्चों के लिए, सरकार आसानी से जहां वे हैं, वहां से उन्हें गुक्त कराने और उन्हें स्कूल उपलब्ध कराने का काम करेगी, कई मामलों में आवासीय सुविधाएं देकर भी। ऐसे माता-पिता और समुदाय जो पारंपरिक रूप से अपनी किशोर बालिकाओं को स्कूल जाने से रोकते हैं या उनका बाल-विवाह कर देते हैं, को समझाने की ज़रूरत है अथवा उनके खिलाफ बाल-विवाह अधिनियम का उपयोग किया जा सकता है। नागरिक समाज का दखल यहां अत्यंत महत्वपूर्ण है।

प्रश्न-26 क्या अधिनियम का लक्ष्य सिर्फ़ कमज़ोर तबका है?

नहीं, यह सार्वभौमिक है। कोई बच्चा जो भारत का नागरिक है, अमीर या गरीब, लड़का या लड़की, किसी भी जाति के माता-पिता के यहां जन्म लिया हो, धर्म या नस्ल का हो, उसे यह अधिकार प्राप्त है। यदि अमीर माता-पिता अपने बच्चे को सरकारी स्थानीय प्राधिकारी के प्रबंधन वाले स्कूल में दाखिल करने का निर्णय लेते हैं तो वह बच्चा भी सभी तरह की निःशुल्क पात्रताओं का अधिकारी होगा। केवल वे बच्चे जिन्हें अपने माता-पिता द्वारा ऐसे स्कूलों (निजी सहायता प्राप्त/गैर सहायता प्राप्त) में भेजा जाता है जो शुल्क वसूलते हैं, धारा 8(अ) के अनुसार, अगर निःशुल्क शिक्षा के अपने इस अधिकार को छोड़ेंगे; तो सरकार से शिक्षा खर्च की प्रतिपूर्ति का दावा नहीं कर सकते (केवल गैर-सहायता प्राप्त स्कूलों के आवश्यक 25 प्रतिशत कोटे को छोड़कर, जो सुविधाहीन और कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए निर्धारित किया गया है (वर्णन बाद में)।

प्रश्न-27 क्या अधिनियम में विकलांग बच्चों को समुचित रूप से संबोधित किया गया है?

इस अधिनियम में त्रुटियां हैं, जिस तरह अगस्त 2009 में विकलांग बच्चों के संबंध में यह पारित हुआ था। उन्हें वंचित समूह की परिभाषा में शामिल किया जाना चाहिए था लेकिन अनजाने में यह छूट गया। अधिनियम कहता है कि उनकी शिक्षा विकलांग अधिनियम 1996 के प्रावधानो का अनुसरण करेगी लेकिन इस अधिनियम में ही खागी है, जैरो इसमें मानसिक विकलांगता को शामिल नहीं किया गया है केन्द्रीय सरकार ने इन कमियों को रवीकार किया है और संसद के 2010 के बजट सत्र में उपयुक्त संशोधन लाने का वादा किया है साथ ही विकलांग अधिनियम 1996 में सभी समुचित संशोधन करने का भी। प्रस्तावित संशोधन प्र.33 में दिए गए हैं।

प्रश्न-28 क्या गंभीर रूप से विकलांग बच्चों की पढ़ाई घर पर ही होने का प्रावधान इस अधिनियम में है?

जैसा अभी अधिनियम में है सभी प्रकार के विकलांग बच्चों की पढ़ाई सबके साथ शाला में ही होगी, गंभीर रूप से विकलांग बच्चों की मी।

प्रश्न-29 वे बच्चे जो अभी स्कूल में नहीं हैं उनका क्या है?

अधिनियम का अनुच्छेद 4 बताता है कि सभी बच्चे जो स्कूल से बाहर हैं, जो कभी नामांकित ही नहीं हुए अथवा जिन्होंने स्कूल छोड़ दिया है (6-14 वर्ष के आयु समूह के) को नियमित स्कूलों में आगु के अनुसार उचित कक्षा में प्रवेश दिलाना होगा। और उनके पास 14 वर्ष की उम्र पार में कर लेने के बाद भी संपूर्ण प्रारंभिक शिक्षा का अधिकार होगा।

प्रश्न-30 'आयु उपयुक्त कक्षा से क्या तात्पर्य है?

इसका अर्थ है ऐसी कक्षा जिसमें बच्चे को सामान्यतः अपनी आयु के अनुसार होना चाहिए यदि वह छह वर्ष की आयु में कक्षा एक में भर्ती होता। अतः यदि बच्चा 11 साल का है और कभी स्कूल नहीं गया, उसे कक्षा पांच में दाखिला दिया जाएगा लेकिन उसके लिए विशेष शिक्षा का प्रबंध किया जा सकता है ताकि वह तीन माह से दो वर्ष तक की एक निश्चित अवधि में उस कक्षा के स्तर को पा सके। [मॉडल नियम 3 (1)]

प्रश्न-31 आदर्श नियम आवासीय सुविधाओं तथा 3 (1) (b) और (c) के प्रयोजनों के लिए विशेष रूप से नियुक्त किए गए अध्यापकों द्वारा ऐसा विशेष प्रशिक्षण उपलब्ध कराते हैं। ऐसे एनजीओ को निहित करने के बारे में क्या विचार है जिनके पास ऐसा कराने के लिए तकनीकी अनुभव हैं?

यदि एनजीओ, अध्यापक की शैक्षणिक योग्यताओं और अन्य मानकों पर खरे उतरते हैं, तब उन्हें सहयोगी बनाया जा सकता है, परंतु केवल नियमित स्कूल के सदस्य के रूप में जहाँ बच्चों का पहले दाखिला होता है, न कि अलग से चलने वाले आवासीय या गैर आवासीय अनौपचारिक केंद्रों की तरह।

प्रश्न-32 क्या बच्चे वास्तव में दो वर्षों में आयु के अनुसार कक्षा के स्तर को पा सकते हैं?

एम वी फॉउंडेशन जैसे समूहों द्वारा इस दिशा में किए गए अग्रणी कार्य से यह पता लगता है कि ऐसा किया जा सकता है। हालांकि विशेष प्रशिक्षण की अवधि के बाद कुछ लचीलेपन का इस्तेमाल किया जा सकता है। यदि बच्चा विशेष प्रशिक्षण पूर्ण करने पर 13 वर्ष का है और उसे आयु के अनुसार कक्षा 7 में होना चाहिए लेकिन शिक्षक/स्कूल अनुभव करे कि उस बच्चे के लिए यह बेहतर होगा कि एक कक्षा नीचे यानी कक्षा 6 में रहे तो वे बच्चे के माता-पिता को इस संबंध में परामर्श दे सकते हैं।

प्रश्न-33 क्या होगा यदि कोई बच्चा छह वर्ष की उम्र के बाद दाखिला ले और कक्षा 8 पूरी करने के पहले ही 14 वर्ष की उम्न पूरी कर ले?

उन्हें कक्षा 8 पूरी करने तक निःशुल्क शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार है भले ही वह 14 वर्ष की उम्र पूरी कर चुका हो। यह, उदाहरण के तौर पर, एक ऐसे 13 वर्षीय बच्चे पर लागू होगा जिरो कभी स्कूल में भर्ती नहीं किया गया और जिसे आठवीं कक्षा पूरी करने में 18 वर्ष या उससे अधिक का होने तक 5 वर्ष लगेंगे।

प्रश्न-34 आयु प्रमाण-पत्र और स्थानांतरण प्रमाण-पत्र क्या हैं?

जन्म, मृत्यु और विवाह पंजीयन अधिनियम 1886 के तहत यदि नियमित जन्म प्रमाण-पत्र जारी नहीं हुआ है, अस्पताल/एएनएम के रिकॉर्ड के आधार पर, आंगनवाड़ी रिकॉर्ड या माता-पिता/संरक्षक के द्वारा शपथ-पत्र के जरिए प्रमाण-पत्र दिया जा सकता है। अधिनियम के अनुच्छेद 14(2) के अन्तर्गत फिर भी यदि कोई ये भी उपलब्ध नहीं करा सकता तो बच्चे को दाखिला देने से इंकार नहीं किया जा सकता अर्थात् यदि मातापिता कहें कि बच्चा 6 साल का या उसरो अधिक का है तो दाखिला देना होगा, जब तक इनमें से उल्लिखित दस्तावेजों की व्यवस्था है।

प्रधान शिक्षक को तुरंत स्थानांतरण प्रमाण-पत्र जारी करना होगा यदि बच्चा स्कूल से दूर जा रहा हो और इसमें विलम्ब करने पर अनुशासनात्मक कार्यवाही का सामना करना होगा। तो भी स्थानांतरण प्रमाण-पत्र के अभाव में किसी बच्चे को दाखिला देने से इंकार नहीं किया जा सकता। [अधिनियम का अनुच्छेद 5(2) और (3)]

सरकार और स्थानीय प्राधिकारियों के कर्त्तव्य

प्रश्न-35 किस तरह के स्कूल बच्चों को प्रदान किए जाएंगे और कब?

अधिनियम में एक तयशुदा अनुसूची के माध्यम से सभी निजी व सरकारी स्कूलों के लिए न्यूनतम मानक व मापदंड तय किए गए हैं। इसमें हर सत्र के लिए शैक्षिक दिवसों की संख्या, हर दिन के शैक्षिक घंटे,कमरों की संख्या, शिक्षण सामग्री की उपलब्धता, पुस्तकालय, शौचालय, साफ़ पीने का पानी, फ्रीड़ा-स्थल, मध्याह्न भोजन के लिए रसोईघर, छात्र शिक्षक अनुपात, 6 से 8 तक की कक्षाओं के लिए विषयगत शिक्षक, अंशकालीन कला, कार्य और शारीरिक प्रशिक्षक इत्यादि शामिल हैं। सरकारी व निजी स्कूल प्रबंधन को तीन सालों के अंदर मौजूदा स्कूलों को इन मानकों के आधार पर उन्नत करना होगा, ऐसा न होने पर उन्हें संचालन की अनुमति नहीं दी जा सकेगी। सरकार को इस तरह के नज़दीकी स्कूल सभी बच्चों के लिए तीन साल के अंदर अर्थात 31 मार्च 2013 तक उपलब्ध कराने होंगे। निर्धारित मानक न्यूनतम हैं, जिसका अर्थ है कि राज्य सरकारों/प्रबंधनों पर अनुसूची में दर्ज मानकों से उच्च मानक तय करने पर कोई रोक नहीं है। विशेष रूप से, यदि कुछ स्कूलों में पहले ही उच्च मानक हैं तो इसका अर्थ यह नहीं कि वे उन्हें अनुसूची के मानकों से मिलाने के लिए उनका स्तर घटा दें।

प्रश्न-36 अधिनियम में 'नज़दीकी स्कूल' को परिभाषित नहीं किया गया। इसे नियमों पर क्यों छोड़ दिया गया?

किसी कठोर राष्ट्रीय मानक को सुनिश्चित करने के बजाय, राज्य इसे अपनी भौगोलिक, सामाजिक और सांस्कृतिक वास्तविकताओं को ध्यान में रखकर परिभाषित कर सकते हैं। मॉडल नियम (4) इन वास्तविकताओं को दर्शाता है, जैसे कठिन भू-भाग, भू-स्टलन के खतरे, बाढ़, सड़कों की उदाहरण के लिए, उचित रूप से स्कूलों का पता लगाना और क्षेत्रीय स्कूलों की उपलब्धता को सुनिश्चित करने के लिए, स्कूलों का भौगोलिक सूचना प्रणाली द्वारा पता लगाना सरकार को स्कूलों के भौगोलिक वितरण, निवास-स्थानों से स्कूलों को दूरी और, यदि कोई हो तो, प्राकृतिक अवरोधों को समझने में सहायता कर सकता है, जैसा कि कुछ राज्य सरकारों द्वारा पहले ही किया जा रहा है।

प्रश्न-39 क्या अधिनियम के लिए कोई वित्तीय प्राक्कलन है? जब इस विधेयक को संसद में पारित किया गया तब इसे संलग्न क्यों नहीं किया गया?

वित्तीय प्राक्कलन शिक्षा योजना और प्रशासन के राष्ट्रीय विश्वविद्यालय द्वारा तैयार किया गया वित्तीय प्राक्कलन यह सुझाव देता है कि इस अधिनियम को लागू करने के लिए आगामी पांच वर्षों में अतिरिक्त 1.71 लाख रुपये (लगभग 34 करोड़ रुपये प्रति वर्ष) की आवश्यकता होगी। चुंकि यह विधेयक पहले राज्य सभा में पेश हुआ, तब इसमें वितीय प्राक्कलन संलग्न नहीं किया गया (केवल एक वित्तीय ज्ञापन-पत्र संलग्न था जिसमें सरकार के संचित कोष में से फंड दिया जाना सुनिश्चित किया गया था)। इस प्रकार के संलग्नक के साथ इसे पहले लोक सभा में (एक मुद्रा विधेयक के रूप में पेश किया जाना चाहिए था, और चूंकि यह पिछली लोक सभा के कार्यकाल के अंत में पारित नहीं हो सका इसलिए यह रद्द हो गया था मानव संसाधन विकारा मंत्रालय द्वारा हाल ही में अधिनियम के लागू होने से पहले एसएसए के तहत शिक्षकों की भर्ती में आई पूर्व कमी को ध्यान में रखते हुए 1.71 लाख करोड़ रुपये के एनयूईपीए के आंकड़े को संशोधित कर पाँच वर्षों के लिए 2.33 लाख करोड़ रुपये कर दिया गया है।

प्रश्न-40 अधिकांश व्यय कौन वहन करेगा? केन्द्र और राज्य की साझेदारी का निर्धारण कैसे होगा?

केन्द्र और राज्य सरकारों के बीच परस्पर साझेदारी का तरीका आपसी समझौते के माध्यम से होगा। सर्व शिक्षा अमियान के कायदों का पुनरावलोकन किए जाने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए, आरटीई एसएराए हारमोनाइज़ेशन समिति की रिपोर्ट ने पहले ही एसएसए के तहत वर्तमान 55:45 के अनुपात के बजाय 75:23 के अनुपात का सुझाव दिया है।

प्रश्न-41 वित्त आयोग सेक्शन 7(4) में संदर्भित संकेत क्या हैं?

इसका मतलब है कि केन्द्र सरकार द्वारा एक संदर्भ के आधार पर वित्त आयोग राज्यों को सीधा फंड स्वीकृत कर सकता है जो केन्द्र द्वारा प्रायोजित योजनाओं के संचालन अधिनियम में साझा अनुपात के लिए होगा। उन राज्यों को जो सबसे ज़्यादा ज़रूरतमंद हैं यह केन्द्रीय कोष से अतिरिक्त स्रोत के रूप में आवंटन करता है। 13वें वित्त आयोग ने विशेष रूप से प्रारंभिक शिक्षा हेतु तब से पॉच वर्ष की अवधि के दौरान 24068 करोड़ रुपये का आवंटन किया है। यह राज्यों को 2008-09 के 65:35 से 2011-12 के 50:50 तक घटते अनुपात से एसएसए के प्रति अपने 15 प्रतिशत के हिररो को पूरा करने में सहायता करेगा, परंतु संभवतः आरटीई की मांगों को पूरा करने में अयोग्य होगा।

प्रश्न-42 स्कूलों का अकादमिक कैलेंडर कौन निर्धारित करेगा?

अधिनियम के अनुसार स्थानीय प्राधिकारी निर्धारण कर सकते हैं। इसमें स्थानीय परिस्थितियों में उपयुक्त कैलेंडर के अनुसार विकेन्द्रीकृत स्कूल की संभावना खुलती है।

प्रश्न-43 क्या सभी दो पारियों वाले स्कूल एक ही पारी में परिवर्तित हो जाएंगे?
यह सिर्फ संकेत करता है कि एक स्कूल प्रतिदिन कितने घंटे चलेगा। बाल श्रमिकों को अन से मुक्त करने का एक लम्बा रास्ता होगा जो दो पारियों में बदलाव के रूप में उन्हें भी स्कूल जाने के अवसर उपलब्ध कराएगा जो श्रम कार्य में व्यस्त हैं।

प्रश्न-44 उन स्थानों पर क्या होगा जहां सरकरी ज़मीन पड़ोस के स्कूल के लिए उपलब्ध नहीं होगी?

कई राज्य इस समस्या का सामना करते हैं, विशेषकर शहरी इलाकों में, परंतु ग्रामीण क्षेत्रों में भी, जैसे कि बिहार में जहाँ अधिकतर भूमि निजी हाथों में है। तब जबकि स्कूल जाना बच्चों का मौलिक अधिकार है. सरकार को अन्य राष्ट्रीय महत्व की परियोजनाओं की तरह जमीन प्राप्त करने या खरीदने पर विचार करना होगा।

प्रश्न-45 क्या अधिनियम बड़े शहरों में सरकारी स्कूलों को बंद कर वाणिज्यिक अचल संपत्ति को बढ़ावा देने के लिए महत्वपूर्ण ज़मीनों को स्थानांतरण करने वाले व्याप्त रुझानों को रोक सकेगा?

चूंकि सरकार को हर बच्चे को तीन साल के अंदर पड़ोस में स्कूल उपलब्ध कराना ही होगा जिसमें बड़ी संख्या में वे बच्चे भी शामिल हैं जो आज स्कूल जाने से वंचित हैं, जमीन और स्कूल के भवन की ज़रूरत व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के लिए बड़े शहरों में गूमि उपलब्ध कराने के लिए महत्वपूर्ण जगहों से स्कूलों को हटाने से बचाने के लिए सरकार को बाध्य करेगी। हर परिस्थिति में इसके लिए सक्रिय नागरिक समुदाय के हस्तक्षेपों की आवश्यकता होगी, जैसी कि इंदौर, कर्नाटक और अन्य क्षेत्रों में देखा गया। क्योंकि पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) तरह की स्कूल व्यवस्थाओं (मुंबई में) में भी भूमि के ऐसे स्थानांतरण की जानकारी का वर्णन किया गया है, यह स्पष्ट होना चाहिए कि पीपीपी के लिए यदि कोई मेमोरेंडम हस्ताक्षरित किए जाते हैं, तो वह इरा अधिनियम के 6 से 14 वर्ष की आयु वर्ग के प्रावधानों तक सीमित होंगे। उन्हें इस अधिनियम से कोई छूट नहीं दी जा सकती। 6 से 14 वर्ष के आयु वर्ग को शिक्षा प्रदान करने वाले स्कूलों के लिए सरकार पीपीपी से मांग नहीं कर सकती क्योंकि तीन वर्ष में सभी बच्चों को निकटमत स्कूल उपलब्ध कराना राज्य की अनिवार्यता है। फिर भी, जैसा कि दिखाई पड़ता है, यदि सरकार 3500 माध्यमिक स्कूलों जिनमें 1 से 8 तक की कक्षाएं संबद्ध हैं, के लिए मेमोरेंडम ऑफ़ अंडरस्टैंडिंग पर हस्ताक्षर करती है, तब अधिनियम के प्रावधान, जैसे कि प्रवेश परीक्षा, प्रतिव्यक्ति शुल्क, सीसीई इत्यादि, इन श्रेणी के स्कूलों पर लागू होंगे।

प्रश्न-46 प्रवासी परिवारों के बच्चे शिक्षा कैसे प्राप्त करेंगे?

यहां दो विकल्प हैं - यदि बच्चे अपने माता-पिता के साथ पलायन करते हैं, विशेष रूप से छोटे बच्चे, प्रवासी क्षेत्रों के स्कूल इन सभी बच्चों को दाखिला देंगे भले ही वे स्थानांतरण प्रमाण पत्र प्रस्तुत न कर सकें या अगर माता-पिता यह मांग करते हैं कि उनके बच्चों को उनके गूल स्थान पर ही शिक्षा उपलब्ध कराई जाए हालांकि वे दूर काम करते हैं, तब उपयुक्त शासन या स्थानीय अधिकारियों को उनके लिए निःशुल्क आवासीय विद्यालयों की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी।

प्रश्न-47 जो बच्चे वंचित समूहों से आते हैं विशेष रूप से उनके साथ किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं होगा यह सुनिश्चित करने का दायित्व किसका होगा?

कानूनी तौर पर उपयुक्त सरकार स्थानीय अधिकारी और स्कूल प्रबंधन समिति, नागरिक समाज के समूहों और नेशनल कमीशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एन सी पी सी आर), स्टेट कमीशन ऑफ प्रोटेक्शन ऑफ चाइल्ड राइट्स (एन सी पी सी आर) की निगरानी द्वारा यह सुनिश्चित किया जाएगा। आदर्श नियम 5,(3) और (4) इसका स्पष्ट रूप से वर्णन करते हैं।

राज्य सरकार स्थानीय प्राधिकरण को यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी बच्चे के साथ जाति, श्रेणी, धर्म अथवा लिंग के आधार पर अनुचित व्यवहार नहीं किया जाएगा।

धारा 8 के खंड (ड) और धारा 9 के खंड (ड) के प्रयोजनों के लिए, राज्य सरकार और स्थानीय प्राधिकरण को यह सुनिश्चित करना होगा कि एक कमजोर वर्ग के बच्चे और एक सुविधाहीन दर्जे के बच्चे को कक्षा में, मध्याह्न भोजन के समय, खेल के मैदान में, सामान्य पानी एवं शौचालय सुविधाओं के इस्तेमाल में,और शौचालय या कक्षा की साफ-सफ़ाई में अलग-अलग कर भेदभाव न किया जाए।

प्रश्न-48 अच्छी गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की सुनिश्चितता कौन करेगा?

उनके अधीन आने वाली सरकारें और शिक्षक संस्थान, जैसे कि एनसीटीई, एसीईआरटी, एससीईआरटी और ऐसे ही अन्य, सरकार द्वारा सुनिश्चित करना कि स्कूल तीन साल के अंदर निर्धारित मानक और मापदंडों का पालन करें, सभी शिक्षक अधिकतम पांच सालों के अंदर पेशेवर रूप से प्रशिक्षित हो जाएं, पाठ्यक्रम सामग्री और प्रक्रिया को सिद्धांत की धारा 29 में दिए गए सिद्धांतों पर बनाया जाए। एक सीसीई प्रणाली कार्यरत हो, और बच्चे ऐसे वातावरण में ज्ञान प्राप्त करें जो डर, चिंता और मानसिक प्रताड़ना से मुक्त हो। सरकार को पूर्ण रूप से ऐरो विश्वविद्यालय, शिक्षा विभागों और नागरिक समाज समुदायों से सहयोग लेगी जिनके पास इस प्रयास में श्रेष्ठ प्राथमिक शिक्षा प्रदान करने का अनुभव हो।

इसके अतिरिक्त मॉडल नियम की धारा 21 (3) में उल्लेख किया गया है कि सरकारों को समय-समय पर समग्र गुणवत्ता का मूल्यांकन नामवर संस्थाओं से करवाना होगा। इन मूल्यांकनों में न केवल बच्चों की समझ को परखा जाएगा बल्कि शिक्षक की गुणवत्ता, भेदभाव, पाठ्यक्रम संबंधी विषयों नगैरह का भी मूल्यांकन किया जाएगा। इस काम में महाविद्यालयों व विश्वविद्यालयों को भी जोड़ना होगा। उच्च शिक्षा प्रदान करने वाले संस्थानों की निरंतर रूप से सहभागिता महत्वपूर्ण होगी। इनकी निगरानी एनसीपीसीआर/एससीपीसीआर तथा नागरिक समाज संस्थानों द्वारा की जाएगी।

स्कूल और अध्यापक

प्रश्न-49 क्या निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत आरक्षण उन स्कूलों पर दायित्व का द्योतक है? क्या निजी स्कूल 25 प्रतिशत से अधिक को दाखिल कर सकते हैं? अनुदान सहायता प्राप्त स्कूलों के क्या दायित्व हैं?

रानी निजी स्कूलों को अपने यहां उपलब्ध सीटों में से 25 प्रतिशत सीटें पास में रहने वाले वंचित समूहों के बच्चों को निःशुल्क शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए भरनी होंगी, जिन्हें बढ़ाया भी जा सकता है। यदि प्रचलित एक किलोमीटर के दायरे में यह संख्या पूरी नहीं होती, तो दायरे को बढ़ाया भी जा सकता है। यह प्रक्रिया प्रति वर्ष उस कक्षा में दोहराई जाएगी जिसमें वे नए बच्चों को दाखिला देते हैं यदि दाखिला कक्षा एक से दिया जाता है तब प्रति वर्ष 25 प्रतिशत बच्चों को उसमें और यदि पूर्व स्कूल कक्षाओं से प्रवेश प्रक्रिया शुरू होती है तब वहां प्रवेश दिया जाएगा। अधिनियम कहता है कि कम-से-कम 25 प्रतिशत की बजाय 'इससे कम नहीं बल्कि ज़्यादा' जिसका अर्थ है कि स्कूल 25 प्रतिशत से भी ज़्यादा सीटों पर इस श्रेणी के बच्चों को दाखिला दे सकता है।

निजी सहायता प्राप्त स्कूलों को भी इसी तरह की पृष्ठभूमि से आने वाले बच्चों को प्रति वर्ष प्रवेश प्रारंभ की जाने वाली कक्षा में सरकार से प्राप्त अनुदान के अनुपात में दाखिला देना होगा और इन बच्चों के लिए उन्हें कोई अतिरिक्त भुगतान प्राप्त नहीं होगा । उदाहरण के लिए, अगर कोई अनुदान प्राप्त रकूल एक विशेष वर्ष में उसके कुल वार्षिक संस्थापन व्यय का 70 प्रतिशत सहयोग सरकार से प्राप्त करता है तो उस वर्ष में उस स्कूल को, कुल 70 प्रतिशत सीटों पर इन बच्चों को प्रवेश कक्षा में दाखिला देना होगा।

इस तरह के प्रवेश प्रति वर्ष केवल प्रवेश कक्षा में ही दिए जाएंगे न कि प्राथमिक स्तर की प्रत्येक कक्षा में।

प्रश्न-50 यह कैसे प्रशासित होगा? सरकारों द्वारा उन्हें किस तरह भुगतान किया जाएगा?

जैसा कि भुगतान के लिए, समुचित सरकार इसकी अपनी और केन्द्रीय भंडार से जिसमें मध्याह्न भोजन शामिल है, एक साल में होने वाले सभी संचालन व्ययों को जोड़कर प्रति छात्र आने वाली लागत का आंकलन करेगी और इस लागत को स्कूल में पंजीकृत बच्चों की संख्या से विभाजित करेगी। गैर अनुदान प्राप्त स्कूलों द्वारा 25 प्रतिशत बच्चों को इस दर पर अथवा स्कूल का शुल्क जो भी कम होगा, का भुगतान किया जाएगा। यदि कोई स्कूल पहले से ही अलग अनुबंध द्वारा, सरकार से मिलने वाली रियायती ज़मीन या अन्य लामों के लिए अनुग्रही है तब उसे इस निश्चित संख्या में बच्चों के दाखिले के लिए अनुबंध में आने वाले बच्चों के प्रतिशत के लिए कोई भुगतान प्राप्त नहीं होगा। मॉडल नियम (7) व (8) में इसकी प्रक्रिया का विस्तार से उल्लेख किया गया है।

प्रश्न-51 निजी स्कूलों के लिए अन्य नियम क्या हैं?

इन स्कूलों को अनूसूची में उल्लिखित कायदों और मानकों को प्राप्त करने का प्रयास करना होगा जिसके लिए उन्हें तीन वर्ष का समय दिया जाएगा। उन स्कूलों के शिक्षकों को पांच वर्ष के अंदर राष्ट्रीय स्तर पर अनुशंसित शिक्षक योग्यताओं को प्राप्त करना होगा। उन्हें तीन वर्षों के अंदर मान्यता प्राप्त करनी होगी; यदि वे तीन वर्षों के बाद भी मान्यता प्राप्त नहीं करते हैं तो उन्हें संचालन की अनुमति नहीं होगी और अगर फिर भी स्कूल संचालित करते हैं तो उन पर भारी जुर्माना थोपा जाएगा। वे प्रवेश देने के लिए बच्चों या माता-पिता से किसी प्रकार का साक्षात्कार या परीक्षा नहीं ले सकते; सभी प्रवेश क्रम रहित चयन पर आधारित होंगे जिनका उल्लंघन करने पर वित्तीय दंड दिया जाएगा। उन्हें सत्र की शुरुआत में ही शुल्क की स्पष्ट घोषणा करनी होगी, उसके बाद, उस वर्ष की अवधि में वे अन्य प्रभार की मांग नहीं कर सकते हैं (कैपीटीशन फीस)।

प्रश्न-52 एक वर्ष की अवधि में कोई बच्चा कब स्कूल में दाखिल हो सकता है?

पूरे वर्ष के दौरान किसी भी समय उन्हें दाखिला दिया जा सकता है जब वह छह साल की अपनी उम्र पूरी कर लेगा, अथवा इससे ज़्यादा उम्र का बच्चा जो स्कूल से बाहर रहा हो।

प्रश्न-53 क्या यह सही है कि किसी भी बच्चे को निष्कासित या अनुत्तीर्ण घोषित नहीं किया जाएगा?

कोई भी सरकारी अथवा निजी स्कूल प्राथमिक स्तर पर किसी भी बच्चे को निष्कासित या अनुत्तीर्ण घोषित नहीं कर सकता। माननीय दिल्ली उच्च न्यायालय ने पहले ही इस पर, इस अधिनियम के आधार पर सेंट जेवियर स्कूल, दिल्ली के विरुद्ध निर्णय दे दिया है जिसमें स्कूल से निष्कासित या अनुत्तीर्ण घोषित किए गए बच्चों को वापिस लेना पड़ा था।

प्रश्न-54 क्या यह शिक्षा की गुणवत्ता पर असर नहीं डालेगा क्योंकि बच्चे आगे बढ़ते जाएंगे चाहे वे कुछ भी सीख न रहे हों?

यह एक आम अनुभव है क्योंकि हम सदियों पुरानी फ़ेल व निष्कासित करने की प्रथा से मानसिक रूप से ग्रस्त हैं। यह धारणा कि एक बच्चे को फेल करके अगले वर्ष उसकी शिक्षा का स्तर बढ़ेगा, के पीछे किसी भी शैक्षणिक अथवा शोध के प्रमाण नहीं हैं। उलटा एक ग़रीब घर के बच्चे को अगर फेल किया जाता है, तो सामाजिक भेदभाव के कारण ज़्यादा संभावना यह है कि बच्चा स्कूल आना ही बंद कर देगा, और पाठशाला त्यागी हो जाएगा। यह एक तरीका है उन बच्चों को शिक्षा से छंटनी करने का जिन्हें हम मंदबुद्धि या पढ़ाई में कमज़ोर होने का ठप्पा देते हैं। इन ठप्पों के पीछे वास्तव में स्कूली व्यवस्था की कमी अधिक प्रखर है न कि बच्चों की कोई प्राकृतिक मानसिक कमी। इसी कारण से समग्र व सतत मूल्यांकन बोर्ड परीक्षा के परिणामों से ज़्यादा उपयुक्त है। चूंकि इस प्रणाली से बच्चों का रतर लगातार परखा जा सकता है और जिन बच्चों को शैक्षणिक दिक्कतें होती हैं उन पर अधिक ध्यान दिया जाता है। यह तरीका फेल व पास प्रणाली से बेहतर है। इस प्रणाली में बच्चों की वह रुचि व योग्यता भी शामिल है जो स्कूली विषयों के अतिरिक्त है। इनको भी बच्चों के रिकॉर्ड में जोड़ा जाना है (देखिए प्रश्न 71) यदि समग्न व सतत मूल्यांकन प्रणाली को सही रूप से ज़मीन पर उतारा जाए तो बच्चों के सतत सीखने की प्रक्रिया को परीक्षाओं के भार से बचाकर बहुत बेहतर बनाया जा सकता है । निजी स्कूलों विशेषकर बच्चों को कमज़ोर करार देकर उनकी छुट्टी करते हैं ताकि वह इस बात के विज्ञापन दे सकें कि उनके स्कूल में कितने मेधावी बच्चे आते हैं - यह केवल और अधिक बच्चों को फांसकर व्यापार बढ़ाने का तरीका है। अधिनियम इस पर रोक लगाने की मंशा से बना है, जिसको दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली के सेंट जेवियर मामले में प्रयोग भी किया है जिसका उल्लेख पहले किया जा चुका है।

प्रश्न-55 क्या स्कूल के नियम और मानक निजी स्कूलों पर ही लागू होंगे?

नहीं, सभी स्कूलों को इन मानकों का पालन करना होगा। भाग 19(1) के अनुसार, किसी भी स्कूल को प्रमाणित नहीं किया जाएगा (सरकार द्वारा), या उसे मान्यता नहीं दी जाएगी (निजी) यदि वह अधिनियम द्वारा निर्धारित मानकों और मानदंडों पर खरा नहीं उतरता।

प्रश्न-56 यदि कोई सरकारी स्कूल इन अनुशंसित नियमों और मानकों को पूरा नहीं कर पाते हैं तब क्या होगा?

यदि इस समस्या का हल स्थानीय स्तर पर नहीं हो सकता तो यह मामला एनसीपीसीआर/एससीपीसीआर अथवा न्यायालय में, कानून के गंभीर उल्लंघन के रूप में जा सकता है।

प्रश्न-57 क्या नियम और मानक (अनुसूचित) परिवर्धित या परिवर्तित किये जा सकते हैं?

हां, और इसके लिए संसदीय संशोधन की ज़रूरत नहीं होगी। अनुच्छेद 20 के अनुसार यह केन्द्र सरकार द्वारा अधिसूचना के माध्यम से किया जा सकता है। संभवतः नेशनल एडवाइजरी काउंसिल को अनुसूची की नियतकालिक समीक्षा का भार सौंपा जाएगा।

प्रश्न-58 क्या सभी स्कूलों में स्कूल प्रबंधन समिति होना आवश्यक है?

सभी सरकारी, सरकारी सहायता प्राप्त और विशेष वर्ग स्कूलों को अधिनियम के भाग 21 के अनुसार एसएमसी का निर्माण करना होगा। क्योंकि निजी स्कूलों को ट्रस्ट/सोसायटी पंजीकरणों के आधार पर प्रबंधन कमेटी बनाना आवश्यक है, वे भाग 21 के अंतर्गत नहीं आते। एक प्रस्तावित संशोधन (प्र. 83 देखें) एसएमसी को संविधान की धारा 29 और 30 के अंतर्गत आने वाले स्कूलों (अल्पसंख्यक स्कूल) के लिए एक संवैधानिक समिति के बजाय एक सलाहकार समिति बनाता है।

प्रश्न-59 स्कूल प्रबंधन समितियों का गठन कैसे होगा?

मॉडल नियम 13 में इसका विवरण दिया गया है। राज्य सरकारें यदि आवश्यक समझें तो इस प्रक्रिया को संशोधित कर सकती हैं। संवैधानिक आवश्यकता के अलावा 75 प्रतिशत सदस्य स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के माता पिता होंगे, कुल सदस्यों का 50 प्रतिशत महिलाएं होंगी तथा आदर्श नियम (मॉडल रूल) के अनुसार अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का चयन अभिभावकों में से ही होगा, और इनकी बैठक महीने में एक बार अवश्य होगी तथा बैठक का कार्यवृत्त जनसाधारण को उपलब्ध कराया जाएगा।

प्रश्न-60 स्कूल विकास योजना क्या है, जो स्कूल प्रबंधन समितियों द्वारा तैयार की जाएगी?

. इसकी व्याख्या मॉडल नियम संख्या 14 में की गई है। यह तीन साल की योजना होगी जिसमें अनुशंसित छात्र-शिक्षक अनुपात के तहत छात्रों की संख्या, शिक्षकों की आवश्यकता के अलावा अधोसंरचनात्मक, वित्तीय आवश्यकताएं वगैरह का आंकलन किया जाएगा। आवश्यकता इस बात की है कि प्रत्येक पंचायत के लिए स्थानीय प्राधिकारी की स्कूल विकास योजना की संयुक्त योजना आवश्यकताओं को नीचे से ऊपर तक विकेन्द्रीकृत ढंग से चिह्नित करेगी, इसकी अपेक्षा ऊपर से नीचे केन्द्रीकृत ढंग से, जो एक आम तरीका है।

प्रश्न-61 क्या अधिनियम 'शिक्षक' को परिभाषित करता है? शिक्षक की योग्यताओं को कौन अनुशंसित करेगा?

हां, यह अनुच्छेद 23(1) में है। केन्द्र सरकार का एक अकादमिक संस्थान जैसे नेशनल काउंसिल फॉर टीचर एजुकेशन शिक्षक की योग्यताओं की अनुशंसा करेगा जिसे देश के सभी शिक्षकों को पांच साल के अंदर प्राप्त करनी होगी। इसमें दोनों अकादनिक और पेशेवर योग्यताएं शामिल होंगी। केंद्रीय सरकार ने पहले ही सूचित किया है कि शिक्षकों के लिए आवश्यक योग्यता एनसीटीई निर्धारित करेगी। एमएचसारडी के अधीन एक विस्तृत कमेटी ने पहले ही शिक्षकों की नई शैक्षणिक योग्यताओं के संबंध में एनसीटीई के समक्ष सुझाव प्रस्तुत कर दिए हैं।

प्रश्न-62 क्या अधिनियम लागू होने के बाद 'पैरा' शिक्षक बने रह सकते हैं?

'पैर' शब्द की कई ध्वनियां हैं। योग्यताओं के संदर्भ में, सभी शिक्षकों को पांच वर्ष के अंदर समान योग्यताएं प्राप्त कर लेनी होंगी, अतः पांच वर्ष बाद कोई कम योग्य पैरा शिक्षक नहीं होगा। इसका एक अर्थ सांविधिक भी हो सकता है। यह सेवा शर्तों द्वारा निर्धारित है। और व्योंकि शिक्षक अधिकतर राज्य सरकार कर्मचारी हैं (केंद्रीय, नवोदय या केंद्र सरकार के समान स्कूलों के अतिरिक्त) वह राज्य सरकार के लिए सुरक्षित है और अधिनियम के अनुसार उनके द्वारा निर्देशित किया जाएगा। हालांकि आदर्श नियन में आदेश है कि राज्यों द्वारा पहले से तैयार की गई सेवा शर्ते और अध्यापन व्यवसाय के अंतर्गत अध्यापकों के लिए लंबी अवधि के सिद्धांत सामर्थ्य देते हैं। इसलिए लघु अवधि के अध्यापन अनुबंध इस प्रकार

के नियमों के अनुकूल नहीं हैं।

प्रश्न-63 शिक्षकों के वेतन के बारे में क्या है?

यह मामला भी राज्य सरकारों के क्षेत्र के अन्तर्गत आता है और उन्हीं के द्वारा अनुशंसित होगा। हालांकि मॉडल नियम 18(3) यह सिद्धांत देता है कि शिक्षकों व स्कूल के बाहर बच्चों को संभालने वालों के वेतन तथा अन्य लाभ नियमित शिक्षकों की तरह ही होंगे और एक समान कार्य व अनुभव के समान होंगे।

प्रश्न-64 यदि शिक्षक अनुपस्थित रहते हैं या पढ़ाते नहीं हैं तब क्या किया जाएगा?

शिक्षक के विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्यवाही की जा सकती है [अनुच्छेद 24(2)]। मॉडल नियम 18(2) के तहत यह व्यवस्था की गई है कि शिक्षकों की सेवा शतों में शिक्षकों का दायित्व स्कूल प्रबंधन समितियों के प्रति होना चाहिए।

प्रश्न-65 अनुसूची में दिए गए छात्र-शिक्षक अनुपात की सुनिश्चितता सरकार को कब तक करनी होगी?

अधिनियम में इसके बारे में कुछ अनिश्चितता है। अनुच्छेद 25(1) कहता है कि अधिनियम की अधिसूचना जारी होने के छह महीने के अंदर सभी स्कूलों को छात्र-शिक्षक अनुपात का पालन करना होगा। किन्तु क्रियान्वयन के लिए स्कूल के नियम और गानकों की अनुसूची जो यह अनुशंसा करती है कि छात्र शिक्षक अनुपात का पालन करने के लिए तीन वर्ष की अवधि दी जाएगी। बिहार, उत्तर प्रदेश, असम और ओडिसा जैसे राज्यों में जहां बड़ी संख्या में नए शिक्षकों की नियुक्तियां करने की जरूरत है इरा अस्पष्टता का लाभ सभी आवश्यक पदों पर, नए शिक्षकों के पदों को रवीकृत करते हुए, पहले छह महीनों के लिए नियुक्तियां दे सकते हैं और सभी नियुक्तियां तीन वर्ष की सगयावधि में 2013 तक जितनी जल्दी हो सकें, पूरी कर सकते हैं।

प्रश्न-66 निर्वाचन प्रक्रिया में शिक्षकों के दायित्व को अस्वीकृत क्यों नहीं किया गया जबकि इसमें उनका अधिकतर समय चला जाता है?

अधिनियम शिक्षकों के द्वारा सम्पन्न किए जाने वाले सभी गैर-अकादमिक कार्यों को प्रतिबंधित करता है पर इनमें निर्वाचन, एक दशक पर होने वाली जनगणना और आपदा संबंधी कार्यों को छूट दी गई है। जिनमें कि जनगणना दस वर्ष में एक बार होती है और आपदा एक विरल परिघटना है। जल्दी-जल्दी होने वाले निर्वाचन विशेष रूप से मतदाता सूचियों की तैयारी लंबी समयावधि के लिए शिक्षकों को स्कूल से दूर रखते हैं, और बच्चे के गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा के अधिकार का हनन कर सकते हैं। यह संविधान का अधिदेश है कि सभी केन्द्रीय एवं राज्य सरकार के कर्मचारियों को निर्वाचन कार्यों में संलग्न किया जा सकता है, जिसका सर्वोच्च न्यायालय ने भी अनुमोदन किया है:

भारत के संविधान के अनुच्छेद 324(6) जनता के प्रतिनिधि अधिनियम, 1951 के अनुच्छेद 159 के साथ पढ़े जाने पर यह अनिवार्य है कि जब निर्वाचन आयोग ऐसा अनुरोध करे तब राष्ट्रपति (भारत सरकार), अथवा राज्यपाल (किसी राज्य की सरकार) के साथ-साथ प्रत्येक स्थानीय प्राधिकार, निर्वाचन आयोग या प्रादेशिक आयुक्त अथवा मुख्य निर्वाचन अधिकारी अथवा रिटर्निंग अधिकारी को, प्रकरण के अनुसार, उतने कर्मचारीवृंद उपलब्ध कराएगा जितने निर्वाचन आयोग को सौंपे गए कार्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक हों।

भारत के चुनाव आयोग बनाम स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में, सर्वोच्च न्यायालय ने इसे स्पष्ट किया कि उन सरकारी कर्मचारियों की सेवाएं जो लोक सेवा के लिए नियुक्त किए गए हैं और केन्द्र अथवा राज्य सरकार के अधीन कार्यरत हैं, इसके साथ ही जो स्थानीय प्राधिकार के कर्मचारी हैं उन्हें निर्वाचन हेतु उपलब्ध रहना होगा और ऐसे सरकारी कर्मचारियों और स्थानीय प्राधिकार के कर्मचारी जो इस आग्रह की अवहेलना करेंगे उन्हें उचित दंड दिया जा सकता है।

अब जब शिक्षा बच्चों का मौलिक अधिकार है, चुनाव आयोग के अनुरोध पर, राज्य सरकारें सुनिश्चित कर सकती हैं कि आयोग को स्कूल शिक्षकों के अलावा कर्मचारी उपलब्ध हों, या शिक्षक न्यूनतम समय के लिए उपलब्ध करा दिए जाएं जिससे अध्यापन के उनके प्राथमिक कार्य में बाधा न पड़े।

प्रश्न-67 क्या सभी शिक्षकों के लिए निजी अध्यापन प्रतिबंधित है?

जैसा कि इस अधिनियम में परिभाषित किया गया है सभी शिक्षकों के लिए जो सरकारी और निजी प्राथमिक स्कूलों में काम करते हैं निजी अध्यापन प्रतिबंधित है। हालांकि यह अधिनियम माध्यमिक स्कूलों के शिक्षकों पर लागू नहीं होता, इरा अधिनियम के तहत अध्यापन पर प्रतिबंध उनके लिए नहीं होगा, यद्यपि राज्य स्तर पर अन्य कानून और सेवा शर्त हो सकती हैं जो माध्यमिक स्तर पर शिक्षकों को निजी अध्यापन देने को प्रतिबंधित करते होंगे, इन्हें प्रभावी बनाए रखा जाएगा।

पाठ्यचर्या, विषयवस्तु और प्रक्रिया

प्रश्न-68 क्या इस अधिनियम में राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा अनिवार्य है?

हां, अनुच्छेद 7(6a) के तहत केन्द्र सरकार, राज्य सरकारों के अकादमिक प्राधिकारियों की सहायता से एक राष्ट्रीय पाठ्यचर्या विकसित करेगी। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि एनसीएफ तैयार करने के लिए एनसीईआरटी का वर्तमान प्रयास एक सलाहकार प्रकृति का था। अधिनियम के अंतर्गत इसे आवश्यक बना दिया गया है और इसमें राज्य सरकारों की भागीदारी भी होगी।

प्रश्न-69 राज्य स्तर पर पाठ्यचर्या और मूल्यांकन प्रक्रिया की अनुशंसा कौन करेगा?

राज्य सरकार अकादमिक प्राधिकारियों को विशेषीकृत करेगी जो राज्य स्तर पर पाठ्यचर्या और मूल्यांकन पद्धति बनाएंगे। इनमें राज्य के, राज्य शैक्षिक अनुसंधान व प्रशिक्षण संस्थान (एससीईआरटी) या अन्य अकादमिक संस्थान हो सकते हैं। हालांकि राज्य स्तर पर तैयार होने वाली पाठ्यचर्या अनुच्छेद 29(2) में उल्लिखित विषयवस्तु और प्रक्रिया के कुछ निश्वित और सामान्य सिद्धांतों के अनुसार ही होगी।

प्रश्न-70 अधिनियम के तहत अकादमिक गुणवत्ता और प्रक्रिया का मुख्य ज़ोर क्या है?

अधिनियन में अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्य अनुसंधान और अकादमिक व्यवहार को प्रमुखता दी गई है, जो बताते हैं -

सभी बच्चों में सीखने के लिए एकसमान सामर्थ्य है। यदि एक बच्चा किसी अन्य से बेहतर है, तब समस्या बच्चे के साथ नहीं, बल्कि भिन्न परवरिश और नियमित व्यवहार में है। इसलिए सिखाने का दायित्व स्कूल और व्यवस्था पर है और बच्चे को अनुत्तीर्ण, दबान या निष्कासन द्वारा दंड देने की अनुशंसा नहीं करता।

परीक्षाओं में अनुत्तीर्ण होने से बच्चे मनोवैज्ञानिक रूप से हतोत्साहित और सामाजिक रूप से अपमानित अनुभव करते हैं। उनकी ज्ञानार्जन की क्षमता में सुधार की बजाय उन्हें अनुत्तीर्ण करने या उन पर दबाव बनाने से छोटे बच्चों में स्कूल छोड़ देने को ही बढ़ावा मिलता है।

अधिनियम में सीखने के ऐसे वातावरण की अनुशंसा की गई है जिसमें बच्चे को भय, चिंता और मानसिक आघात न हों, स्कूली विषयों में उत्कृष्टता की अपेक्षा उनके सर्वांगीण विकास को बढ़ावा दिया जाए, बच्चे के ज्ञान, क्षमताओं और प्रतिमा का निर्माण किया जाए, संविधान में वर्णित मूल्यों को आत्मसात करना, गतिविधियों के माध्यम से सीखना, बच्चे पर केन्द्रित और उसके तरीकों पर केन्द्रित ढंग से खोज और अन्वेषण पर ज़ोर देना, जहां तक संभव हो सके निर्देशों की भाषा के रूप में मातृभाषा का इस्तेमाल करते हुए, और बोर्ड परीक्षाओं की अपेक्षा विशद एवं सतत मूल्यांकन किया जाना चाहिए।

यह अधिनियम एनसीएफ 2005 में दिए गए नियमों को लगभग कानूनी मान्यता देता है। जहाँ तक इन नियमों के लागू होने का सवाल है, एनसीएफ 2005 में वर्णित सुझावों और इससे जुड़े 22 केंद्रित वर्गों की रिपोर्ट, साथ ही एससीईआरटी तथा कुछ अन्य राज्यों द्वारा निर्मित पाठय पुस्तकें, पाठ्य सामग्री, सेवारत शिक्षक प्रशिक्षण गॉड्यूल्स, सीसीई निदेशिका आदि बेहतर सुधार के लिए भविष्य में लागू करने हेतु एक बृहत निवेश हो सकते हैं।

प्रश्न-71 यदि बोर्ड परीक्षाएं नहीं होंगी, तब बच्चों को अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी करने पर कैसे प्रमाणित किया जाएगा?

प्रमाणीकरण की प्रक्रिया मॉडल नियम 23 में दी गई है। प्रमाण पत्र में स्कूली विषयों से परे बच्चे की प्रतिभाओं और योग्यताओं का संचयी रिकॉर्ड दिया जाएगा। इसका निहितार्थ है कि इस तरह का संचयी रिकॉर्ड आठ साल तक के प्राथमिक स्तर तक प्रत्येक बच्चे का रखा जाएगा और शिक्षकों को इस कार्य के लिए प्रशिक्षण और अन्य माध्यमो से मदद की जाएगी।

प्रश्न-72 शिक्षकों के प्रशिक्षणों के मानकों को कौन क्रियान्वित करेगा?

अनुच्छेद 7 (6b) में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि केन्द्र सरकार शिक्षकों के प्रशिक्षणों

के मानकों को विकसित और लागू करेगी।

प्रश्न-73 नवाचार और अनुसंधान के बारे में इस अधिनियम में क्या है?

राज्य सरकारें अनुसंधान और नवाचारों को बढ़ावा देने के लिए तकनीकी सहायता और संसाधन उपलब्ध कराएंगी, योजना और क्षमता संवर्धन का कार्य केन्द्र सरकार के सुपुर्द होगा (अनुच्छेद 7(6c)। मॉडल नियन 19 (2)(b) में दिया गया है कि शिक्षक पाठ्यचर्या निर्माण, पाठ्यक्रम के विकास प्रशिक्षण गॉड्यूल्स की तैयारी और पाठ्य-पुस्तक विकास के कार्यों में, इस तरह कि इन कार्यों से उनके नियमित शिक्षण पर कोई असर नहीं हो, भागीदारी कर सकते हैं।

बच्चों के अधिकारों की सुरक्षा और निगरानी

प्रश्न-74 यदि किसी बच्चे को स्कूल में प्रवेश नहीं दिया जाता, उसे पीटा जाता है या उसके साथ भेदभाव किया जाता है, या किसी अन्य तरीके से उसके अधिकार का हनन होता है, तब ऐसे में निवारण तंत्र क्या होगा?

यह कल्पना की जा सकती है कि कई शिकायतों का निवारण स्कूल और स्कूल प्रबंधन समिति अपने स्तर पर ही कर सकती हैं। यदि ऐसा नहीं होता है तब अगला कदम यह हो सकता है कि स्थानीय प्राधिकारी के समक्ष शिकायत दर्ज की जाए। इसके बाद भी यदि स्थानीय प्राधिकारी द्वारा की गई कार्यवाही संतोषजनक नहीं पाई जाती तब एससीपीसीआर से अपील की जा सकती है।

प्रश्न-75 क्या एनसीपीसीआर (बाल अधिकारों की सुरक्षा के राष्ट्रीय आयोग)/एससीपीसीआर स्वतः कार्यवाही कर सकते हैं, तव भी जब शिकायत दर्ज़न की गई हो?

हां, एनसीपीसीआर और एससीपीसीआर दोनों ही स्वतः कार्यवाही कर सकते हैं तब भी जब कोई विशेष रूप से शिकायत दर्ज नहीं भी करता है। मॉडल नियम 25 के अनुसार एससीपीसीआर बाल सहायता केन्द्र/हेल्पलाइन्स स्थापित कर सकते हैं, जहां एसएमएस, टेलीफोन और पत्रों के नाध्यम से शिकायते प्राप्त और दर्ज की जा सकती हैं।

वर्तमान समस्या (अप्रैल 2010) यह है कि एनसीपीसीआर पुनर्निर्माण की प्रक्रिया में है और केवल पाँच राज्यों में एससीपीसीआर का गटन हुआ है जिनकी सामर्थ्य अलग-अलग है। दोबारा पूर्ण रूप से क्रियाशील होने पर एनसीपीसीआर को सुधार लाने के ठोस नियम और तरीके खोजने होंगे और ऐसा करने के लिए एससीपीसीआर को सहायता प्रदान करनी होगी। पुनर्निर्मित एनसीपीसीआर रो यह अपेक्षित है कि वह जाँच के लिए नागरिक समाज संस्थाओं के साथ संपर्क और संबंध कायम करने, एवं अधिनियम के प्रवर्तन के लिए राज्य आयुक्तों की नियुक्ति करने (भोजन के अधिकार के लिए उच्च न्यायालय आयुक्तों की तर्ज पर), मानवाधिकार, महिलाएं और अल्पसंख्यकों की भांति अन्य आयोगों से संबंध बनाने, हेल्पलाइन शुरू करने और आरटीई को सुदृढ़ करने के लिए अलग से एक विभाग बनाने के अपने पहले के प्रस्तावों को आगे बढ़ाएगी।

मॉडल नियमों के अनुसार जिन राज्यों में अभी एससीपीसीआर नहीं हैं (महिला एवं बाल विभाग द्वारा निर्मित). उनमें एससीपीसीआर लागू होने तक शिक्षा विभाग द्वारा शिक्षा अधिकार सुरक्षा प्राधिकरण का गठन किया जाएगा।

प्रश्न-76 एनसीपीसीआर/एससीपीसीआर के पास किस तरह की शक्तियां हैं? क्या ये दंड दे सकते हैं?

एनसीपीसीआर अधिनियम 2005 के तहत, एनसीपीसीआर और एससीपीसीआर को अर्द्ध न्यायिक शक्तियां प्राप्त हैं जिनके द्वारा दे जाँचपड़ताल, समन और न्यायालय को प्रकरणों की सिफारिश कर सकते हैं। हालांकि वे निर्णय जारी नहीं कर सकते और सज़ा नहीं दे सकते।

प्रश्न-77 न्यायालयों के बारे में क्या है? किस न्यायालय में और कौन जा सकता है?

चूंकि यह कानून मौलिक अधिकार से निकला है, यह देश के निचले न्यायालय से लेकर उच्च न्यायालय तक न्यायाधीन है। कोई भी, निचले सिविल न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय/सर्वोच्च न्यायालय में प्रकरण दर्ज़ कर सकता है, हालांकि यह शिकायत की प्रकृति पर निर्भर करता है।

प्रश्न-78 क्या निगरानी में गैर-सरकारी संगठनों/ नागरिक समाजों की कोई भूमिका है?

एनसीपीसीआर पहले से ही इस दिशा में गैर-सरकारी संगठनों माध्यम से पहल शुरू कर चुकी है। इससे अलग, गैर-सरकारी संगठन और अन्य नागरिक समाज समुह किसी भी प्रकार से इस अधिनियम के हनन की जानकारी प्राधिकारियों और न्यायालय के संज्ञान में ला सकते हैं। इसका एक उदाहरण नागरिक समाज का एक समूह सोशल ज्यूरिस्ट दिल्ली में काम कर रहा है। वे आवास के निकट स्कूल खोलना, शिक्षकों की उपलब्धता की जाँच को सुनिश्चित कर सकते हैं और सार्वजनिक सुधार प्रक्रिया में सहायता कर सकते हैं।

प्रश्न-79 यदि समस्याएं स्थानीय न होकर उच्च स्तर पर हों जैसे धन की उपलब्धता, अपर्याप्त शिक्षक नियुक्तियां आदि, तो क्या होगा?

चूंकि अधिनियम में सरकारों पर यह बाध्यता है, एनसीपीसीआर/एससीपीसीआर और न्यायालयों को यह पड़ताल करनी होगी कि कहां इस इस तरह की अवहेलना मौजूद है और उसी के अनुसार निर्णय देना होगा।

अन्य विषय

प्रश्न-80 नियम कौन बनाता है। केन्द्र सरकार या राज्य सरकारें?

चूंकि इस अधिनियम में केन्द्र और राज्य सरकारें दोनों ही शामिल हैं अतः दोनों को ही नियम बनाने होंगे। केन्द्रीय नियमों को पहले ही अंतिम रूप दिया जा चुका है और केन्द्र द्वारा राज्यों को, राज्यों के लिए मॉडल नियमों का सेट दिया जा चुका है। राज्य चाहें तो इन मॉडल नियमों को यथास्थिति में स्वीकार कर सकते हैं अथवा उसमें समुचिरा बदलाव भी कर सकते हैं। अन्ततः केन्द्र सरकार को संसद में इन नियमों को पेश करना होगा और राज्यों को उनकी अपनी विधान सभाओं में। नियमों को केन्द्र अथवा राज्यों द्वारा आवश्यकतानुसार परिवद्धित किया जा सकता है।

प्रश्न-81 1अप्रैल, 2010 से सर्व शिक्षा अभियान का क्या होगा?

सर्व शिक्षा अभियान का शिक्षा का अधिकार अधिनियम के साथ समावेश किया जा सकता है। इसके लिए विभिन्न नियमों में परिवर्तन करने की आवश्यकता होगी, धन बांटने के नए तरीके पर काम करना होगा और इसकी प्रशासनिक संरचना में आवश्यक बदलाव करने होंगे। शिक्षा का अधिकार अधिनियम, मौजूदा सर्व शिक्षा अभियान की तरह कोई योजना नहीं है। यदि सर्व शिक्षा अभियान को शिक्षा का अधिकार अधिनियम को कार्यान्वित करने का काम करना है तो इसे अपने परियोजना आधारित तौर-तरीकों में बदलाव करना होगा। शिक्षा का अधिकार और सर्व शिक्षा अभियान का समावेश करने वाली समिति पिछले तीन महीनों में इन विषयों पर काम कर रही है और इसकी रिपोर्ट सर्व शिक्षा अभियान की भावी स्थिति का आधार हो सकती है। एक आरटीई-एसएसए सामंजस्य समिति द्वारा इन विचार किए जाने के फलस्वरूप इसकी विस्तृत रिपोर्ट अब सार्वजनिक है। यह अधिनियम को लागू करने की रुपरेखा की भांति है। आशा है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय जितना जल्दी हो सके इस रिपोर्ट की अधिसंख्यक प्रतियाँ उपलब्ध कराएगा।

प्रश्न-82 राष्ट्रीय शैक्षिक प्राधिकरण और राज्य शैक्षिक प्राधिकरण की भूमिका क्या होगी?

ये प्राधिकरण सलाहकार मंडल की तरह काम करेंगे। ये शोध और अध्ययनों को सुचारु बनाने का काम तथा व्यवस्थित मूल्यांकन अधिनियम के क्रियान्वयन के सुधार में सहयोग करेंगे। राष्ट्रीय अकादमिक परिषद अधिनियम में संलग्न अनुसूची में निहित नियमों और मानकों के आधार पर स्कूल की निगरानी करने वाले निकाय की तरह काम करेगी और जहां आवश्यक होगा इनमें बदलाव किए जाने की सलाह देगी।

प्रश्न-83 क्या अधिनियम में कोई अन्य संशोधन अभी प्रस्तावित हैं?

संसद के 2010 बजट सत्र में दो संशोधन प्रस्तावित किए गए हैं जो शायद मानसून सत्र में पारित होंगे। प्रस्तवित संशोधन इस प्रकार हैं

विकलांग बच्चों को अनुचोद (d) में असुविधाग्रस्त समूह के बालक की परिभाषा में जोड़ना।

खंड 2(e) के बाद निम्नलिखित खंड सम्मिलित किया जाएगाः (ee) एक “विकलांग बच्चा" में शामिल हैं: (a) पर्सन्स विद डिसएबिलिटीज़ एल्ट, 1995 के खंड (i) में दिए गए वर्णन के अनुसार एक “विकलांग बच्चा;" (b) नेशनल ट्रस्ट फॉर वेलफेयर पर्सन्स विद ऑटिज्म, सेरेबरल पाल्सी, मेंटल स्टार्टेशन एंड मल्टीपल डिसएबिलिटीज़ एक्ट, 1999 की धारा 2 के खंड (i) के वर्ण के अनुसार एक बव्या, विकलांग व्यक्ति होने के नाते; (C) नेशनल ट्रस्ट एक्ट, 1999 की धारा 2 के खंड (0) के वर्णन के अनुसार एक "अति विकलांग"बच्चा।

अधिनियम की धारा 21 की उपधारा (2) में, निम्नलिखित प्रावधानों को सम्मिलित किया जाए : "एक ऐसे स्कूल के संदर्भ में उपधारा (1) के अंतर्गत गठित स्कूल प्रबंधन समिति, जिसे चाहे धर्म अथवा भाषा पर आधारित अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित एवं प्रबंधित किया गया हो, केवल सहायक कार्य करेगी।"

अधिनियम की धारा 3 को भी संशोधनों (i) और (ii) को दर्शाने के लिए संशोधित किया गया है तथा धारा 22 को भी संशोधन (iii) दर्शाने के लिए संशोधित किया गया है।

राज सरकार के तात्कालिक कार्य

केन्द्र सरकार के कार्य

केन्द्रीय नियमों की घोषणा करना।

शिक्षकों की योग्यताओं को अधिसूचित करना

अधिनियम के साथ तालमेल करके सर्व शिक्षा अभियान के परिवर्द्धित रूप को सामने लाना (संबंधित समिति कि रिपोर्ट पहले ही प्रकाशित हो चुकी है। इसे व्यापक रूप से उपलब्ध करने की आवश्यकता है)।

राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की स्थापना।

राज्यों के साथ समुचित धन भागीदारी के तरीके पर कार्य करना ।

राज्यों को सीसीई में, पाठ्यक्रम और कक्षा संचालन की गतिविधियों में अकादमिक सहयोग करना ।

पेशेवर शिक्षक योग्यताओं की विषयवस्तु को परिभाषित करना जिसे बिन्दु2 के बाद अंतिम रूप दिया जाएगा।

पंचवर्षीय शिक्षक योग्यता के लक्ष्य को प्राप्त करने के क्रम में समुचित शिक्षक शिक्षण सुविधाओं और रणनीतियों पर काम करना ।

विकलांग बच्चों से संबंधित संशोधन को शामिल करना (संसद में पहले ही पेश किया जा चुका है।)।

. नागरिक सोसायटी वर्गों के साथ मिलकर एसएमसी, स्थानीय प्राधिकरणों और अन्य संबंधित एजेंसियों को तैयार करने के लिए एक सशक्त जन अभियान प्रारंभ करना ताकि अधिनियम को प्रभावशाली रूप से लागू किया जा सके। बेहतर सुधार, पाठ्यक्रम की रूपरेखा तैयार करने, शिक्षकों के प्रशिक्षण आदि में विशेषज्ञता प्राप्त विश्वविद्यालयों और गैर-सरकारी एजेंसियों को शामिल करने के लिए उचित कार्रवाई करना। राज्य सरकारों की सहायता करना ताकि वे भी इन एजेंसियों के साथ ऐसे कार्य करने का बीड़ा उन सकें।
संलग्नक

शिक्षा अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत बाल-अनुकूल शिक्षा के विषय में अतिरिक्त प्रश्न

प्र. शिक्षा के अधिकार अधिनियम की व्यवस्थाओं के अधीन स्कूल के लिए बाल-अनुकूल का अर्थ क्या है?

अध्याय v में बुनियादी शिक्षा के पाठ्यक्रम एवं समापक को चर्चा करें तो शिक्षा का अधिकार अधिनियम में यह संकेत है कि उप धारा (1) के अधीन पाठ्यक्रमों के निर्धारित और प्रक्रिया के मूल्यांकन के समय शिक्षा के अधिकारी निम्नलिखित पर गौर करेंगे जैसेः (e) बच्चों के अनुकूल और उन्हीं पर केन्द्रित तरीकों से कार्य-गतिविधि,नवीनता और खोज के जरिए शिक्षा प्रदान करना।

बच्चों के सर्वांगीण विकास में मदद के लिए शिक्षा और सीख के साथ स्कूल के पाठ्यक्रम में किन चीज़ों को शामिल करना चाहिए जिससे गुणवत्ता के साथ समानता सुनिश्चित हो सके, उसके लिए बाल अनुकूल स्कूल एवं प्रणाली (सीएफएसएफ) एक व्यापक ढांचे के रूप में उदय हुई है। बाल अनुकूल शिक्षा में बच्चों पर केन्द्रित परिणामों और परिवेश पर आधारित, स्कूलों के मूल्यांकन और निरीक्षण हेतु गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और उद्देश्यों के लिए शिक्षा, अधिकार अधिनियम के अन्तर्गत राहभागीपूर्ण और व्यापक दृष्टिकोण होना आवश्यक है। इसमें नीतियों की सुचना, नियोजन, शिक्षक समर्थक प्रणालियां और शिक्षण सामग्री और शिक्षण प्रक्रियाएं शामिल हैं जिसमें बच्चे की मैत्रीपूर्ण सोच व सिद्धान्तों को समन्वित किया जाता है।

शिक्षा का अधिकार अधिनियम की उपलब्धियों पर विचार दर्शाता है कि स्कूल और समुदाय बच्चों के लिए नहीं अपितु बच्चों से अपेक्षा रखते हैं कि स्थानीय विभाग व सामाजिक संस्थाओं को आकर्षित और संभाल के रखें, विविधता का सम्मान करें और सहभागिता व समानता सुनिश्चित करें। इसके लिए जरूरी यह नहीं कि सारे बच्चे स्कूल जाएं लेकिन यह सुनिश्चित हो कि सभी स्कूल निम्नलिखित क्षेत्रों में काम करके अपनी ज़िम्मेदारियों को निभाएं और बच्चों के श्रेष्ठ हित में निम्नलिखित काम करें:

ऐसे सुरक्षित और संरक्षित स्कूल होने चाहिए जहां पर्याप्त स्टाफ व प्रशिक्षित एवं ज़िम्मेदार शिक्षक हों, संसाधन भरपूर हों और सीखने की उपयुक्त व्यवस्थाएं हों।

यह मानते हुए कि भिन्न-भिन्न बच्चों की अलग-अलग परिस्थितियां होती हैं और आवश्यकताएं भी विभिन्न होती हैं, स्कूल में समुदाय की सारी सुविधाएं होनी चाहिए और उन्हें घर व समुदाय के परिवेश की बाधाओं से मुक्त रखा जाना वाहिए। घर वा

बच्चों में सोचने व कारण जानने की क्षमता को बढ़ाने, उनमें आत्मसम्मान और दूसरों के सम्मान की भावना जगाने और समुदाय के सिद्धान्त तथा विश्व के नागरिक के रूप में उनके व्यक्तित्व में पूर्ण निखार लाने की ज़िम्मेदारी को निभाना चाहिए।

बाल-अनुकूल स्कूल व प्रणाली, गुणवत्ता व समानता की बहुआयामी सोच पर आधारित है जो एक प्रशिक्षार्थी के तौर पर बच्चों की आवश्यकताओं को पूरा करते हुए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए एक व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करती है. इसके तीन निर्देशन सिद्धान्त हैं।

बाल केन्द्रित

इस सिद्धान्त में सी एफएसएरा के सभी पहलुओं में बच्चों को बेहतर देखभाल पर जोर दिया गया है। पाठ्यक्रम तैयार करने की प्रक्रिया में सभी बच्चों के श्रेष्ठ हितों और विचारों को शामिल किया जाना चाहिए और बाल-अनुकूल स्कूल (हिंसा, सुरक्षित परिवेश, पानी, स्कूल संचालन) के अन्य सभी पहलुओं का भी समावेश करना चाहिए। शिक्षा के पक्षधरों (माता-पिता, शिक्षक, शिक्षा प्रशासक एवं अन्य) की ज़िम्मेदारी होती है और साथ में सभी बच्चों के कल्याण के आधार पर निर्णयों को संरक्षण देने का अधिकार भी उनका होता है।

लोकतांत्रिक भागीदारी

अपनी शिक्षा के तरीकों और तत्वों के विषय में कहने का अधिकार बच्चों का होता है। बाल अनुकूल स्कूल बच्चों के विकास और देखभाल पर भी जोर देते हैं इसीलिए उनसे संबंधित हर निर्णय और उनकी शिक्षाओं के मूल्यांकन के

विषय में उनकी सहभागिता को अनदेखा नहीं कर सकते। इस सिद्धान्त में इस बात पर जोर दिया गया है कि सभी बच्चों, उनके माता-पिता और समुदाय के नेताओं की, शिक्षा का ढांचा, विषय-वस्तु और प्रक्रिया के निर्धारण में भूमिका होती है। इस तरह की लोकतांत्रिक सहभागिता और संचालन से स्कूल प्रणाली बच्चों के शिक्षा के अधिकार को पूर्ण करने का दावा कर सकती है। इसका अर्थ यह है कि बच्चे जो सीखते हैं उनके जीवन और आवरण में वह प्रतिबिम्बित होता है। इसके अतिरिक्त बेहतर सामर्थ्य स्कूल उन परिवारों को मजबूत करने के लिए भी काम करते हैं जिन्हें स्कूल में सफलता के लिए अतिरिका समर्थन की आवश्यकता होती है। वे समुदाय और शिक्षकों के बीच महत्वपूर्ण संबंध स्थापित करके ऐसा कर सकते हैं। स्कूल और परिवार बच्चों पर सर्वाधिक प्रभाव डालते हैं। इसीलिए हर निर्णय और कार्य गतिविधियों में माता-पिता और अभिभावकों तथा समुदाय के प्रमुख व्यक्तियों को सम्बद्ध करना बहुत ज़रूरी है।

• शामिल करना

सभी बच्चों को शिक्षा का अधिकार है। बच्चों को शिक्षा की व्यवस्थाएं उपलब्ध कराना समाज का अधिकार ही नहीं बल्कि बच्चों के प्रति समाज का कर्तव्य है। इसीलिए स्कूल बिना भेदभाव के सभी बच्चों के लिए खुले होने चाहिए। स्कूल को बदले में बच्चों से कुछ नहीं मांगना चाहिए बल्कि सभी बच्चों को सक्रिय रूप से स्कूल में जगह देनी चाहिए। स्कूल में भर्ती से अधिक उनकी देखभाल में मदद पर जोर दिया जाना चाहिए और साथ में नियमित उपस्थिति के लाभ बताए जाने चाहिए। इसका अर्थ है कि स्कूल शिक्षा के लिए निष्पक्ष, पारदर्शी, भेदभाव रहित नियन पर्याप्त नहीं हैं। योग्य बच्चों को शिक्षा में सक्रिय और समान रूप से भाग लेने के अवसरों को रोकने वाली बाधाओं का निदान करने के लिए नीतियां और उपाय भी होने चाहिए। इतना ही नहीं समाज के सभी वर्ग की लड़कियों, लड़कों, महिलाओं और पुरुषों का शिक्षा पद्धति में समान रूप से भाग लेने का अधिकार है।





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